हिंदी कविता - चेतक की वीरता (Hindi Poem - Chetak Ki Veerta)

Chetak Ki Veerata

रण–बीच चौकड़ी भर–भरकर

चेतक बन गया निराला था।
राणा प्रताप के घोड़े से¸
पड़ गया हवा को पाला था।

गिरता न कभी चेतक–तन पर¸

राणा प्रताप का कोड़ा था।
वह दोड़ रहा अरि–मस्तक पर¸
या आसमान पर घोड़ा था।

जो तनिक हवा से बाग हिली¸

लेकर सवार उड़ जाता था।
राणा की पुतली फिरी नहीं¸
तब तक चेतक मुड़ जाता था।

कौशल दिखलाया चालों में¸

उड़ गया भयानक भालों में।
निभीर्क गया वह ढालों में¸
सरपट दौड़ा करवालों में।

है यहीं रहा¸ अब यहां नहीं¸

वह वहीं रहा है वहां नहीं।
थी जगह न कोई जहां नहीं¸
किस अरि–मस्तक पर कहां नहीं।

बढ़ते नद–सा वह लहर गया¸

वह गया गया फिर ठहर गया।
विकराल ब्रज–मय बादल–सा
अरि की सेना पर घहर गया।

भाला गिर गया¸ गिरा निषंग¸

हय–टापों से खन गया अंग।
वैरी–समाज रह गया दंग
घोड़े का ऐसा देख रंग।

- श्यामनारायण पाण्डेय (Shyam Narayan Pandey)


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