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चूँकि अब गुरु जी के अनुसार शिष्यों की पुस्तिका में जीवन यापन के लिए आवश्यकता से अधिक ज्ञान आ चुका था और उनके हिसाब से शिष्यों के लिए कुछ भी नया सीखना शेष नहीं रह गया था तो गुरु जी ने शिष्यों को आदेश दे डाला कि वे जो भी काम करें पुस्तिका के अनुसार ही करें और यदि पुस्तिका में नहीं लिखा तो ना करें और अपनी अक्ल तो बिलकुल ना दौड़ाएं। क्योंकि गुरु जी के हिसाब पुस्तिका में आवश्यकता से अधिक ज्ञान था तो गुरु जी ने पुस्तिका में कुछ भी ज्ञान की नयी बात लिखने से शिष्यों को मना कर दिया , यहॉँ तक की गुरूजी खुद बोलें तो भी नहीं। शिष्यों के लिए तो गुरु जी का आदेश जैसे भगवान का आदेश था। उन्होंने भी तुरंत प्रभाव से पुस्तिका में कुछ भी नया लिखना बंद कर दिया और अपने जीवन का हर कार्य वो पुस्तिका के अनुसार ही किया करते थे। शिष्यों की जिंदगी में कोई समस्या न रही , हर समस्या का समाधान पुस्तिका में उपलब्ध था।
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कुछ दिन बाद गुरु जी अपने शिष्यों के साथ नदी पार कर रहे थे कि अचानक उनका पैर पुल से फिसल गया और वे नदी में जा गिरे। गुरु जी को तैरना ठीक से नहीं आता था और पानी का बहाव कुछ तेज था तो गुरु जी संभल नहीं पाए और डूबने लगे। उन्होंने शिष्यों की ओर देखकर आवाज लगनी शुरू कर दी , बचाओ - बचाओ। गुरु जी को डूबते देखकर और उनकी बचाओ बचाओ की आवाज सुनकर शिष्यों ने तुरंत पुस्तिका खोल ली और ढूंढ़ने लगे की यदि कोई डूब रहा हो और सहायता के लिए पुकार रहा हो तो क्या करना करना चाहिए। लेकिन पुस्तिका में तो ऐसी परिस्थिति के बारे में कुछ लिखा ही नहीं था। शिष्य चुपचाप खड़े रहे। गुरु जी ने पूछा कि क्या हुआ तो शिष्यों ने बताया कि पुस्तिका में ऐसी परिस्थिति के बारे में कुछ नहीं लिखा इसलिए वे कुछ नहीं कर सकते। गुरु जी ने अपना सिर पीट लिया और चिल्ला कर बोले , मैं कह रहा हूँ , जल्दी से अपनी पुस्तिका में लिख लो कि डूबते को बचाना चाहिए और शीघ्रता से मुझे बचाओ। शिष्यों ने कहा , क्षमा करें गुरु जी , हम ऐसा नहीं कर सकते क्योंकि पुस्तिका में कुछ भी लिखने से आपने मना किया है। कुछ शिष्य गुरु जी को बचाने के लिए तत्पर हुए तो बाकी शिष्यों ने यह कहकर उन्हें रोक दिया कि पुस्तिका में लिखे कार्य के अतिरिक्त कुछ भी करने से गुरूजी नाराज हो जायेंगे।
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तभी वहां से कुछ नाविक जा रहे थे। जब उन्होंने गुरु जी को डूबते देखा और शिष्यों को चुपचाप किनारे पर खड़े देखा तो उन्होंने तुरंत गुरु जी को बचाया और गुरु जी को किनारे पर लाकर बोले , "क्या गुरु जी आपने ना तो अपने शिष्यों को तैरना सिखाया और ना ही शोर मचाकर सहायता मांगना सिखाया। " गुरु जी को काटो तो खून नहीं। उन्हें अपनी गलती समझ आ गयी , उन्होंने शिष्यों को व्यावारिक ज्ञान तो दिया नहीं बल्कि पुस्तिका का अनुसरण करने को कहकर लकीर का फकीर बना दिया। अपनी गलती का आभास होते ही गुरु जी ने सभी शिष्यों से उनकी पुस्तिका लेकर फाड़ दीं और शिष्यों को व्यावहारिक जिंदगी जीने का निर्देश दिया।
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