दादा जी 65 के हो चले थे। अभी पाँच साल पहले ही उनकी रिटायरमेंट हुई थी। काफी पैसा जमा था उनके पास। बच्चे भी बड़े हो चुके थे और अच्छा कमा खा रहे थे। पोते पोतियों के शोर शराबे से घर का आंगन भरा रहता था। सीधे शब्दों कहें तो किसी चीज की कोई कमी नहीं थी जिंदगी मज़े में कट रही थी। बहुएँ तो दादा जी का ख्याल बेटियों से भी बढ़कर रखती थीं। यूँ कहें तो घर में राम राज्य था। अब सुख भी हमेशा कहाँ रहता है। पिछले कुछ दिनों से दादा जी को लग रहा था की घर में उनका ख्याल ठीक ढंग से नहीं रखा जा रहा था , खासतौर से दूध को लेकर। उनको दूध पीने का बहुत शौक था। वो अपने लिए एक किलो दूध अलग से मंगवाते थे। पर कुछ दिनों से उनको लग रहा था कि उनकी बहुएँ उन्हें दूध में पानी मिलकर देती हैं। अब राम ही जाने की नीयत बहुओं की खराब थी या बुढ़ऊ ही सठिया गए थे। जो भी कहें रंग में भंग तो पड़ गया था। बेटों ने उनको बहुत समझाने की कोशिश की पर उनको लगता था की उनके बेटे जोरू के गुलाम बन चुके हैं, सो वो अपने बेटों की बात भी मानने के लिए तैयार न थे। अब शक की कोई दवा तो होती नहीं , तो घर वालों के पास भी इस समस्या का कोई इलाज नहीं था । इधर घरवाले दादा जी के बदले व्यव्हार से दुखी , उधर दादा जी दूध में पानी से दुखी। घर में अशांति ने जन्म ले ही लिया।
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आखिरकार एक दिन दादा जी ने वो किया , जिसकी किसी को उम्मीद ना था। उन्होंने विशेषकर अपने लिए अलग से एक नौकर रख लिया। सबको बहुत बुरा लगा। ये तो अब खुले आम शक करने वाली बात हो गयी। खैर अच्छा भी था , अब कम से कम एक किलो दूध के लिए घरवालों को दोष तो ना दे पायेंगे। अब दादा जी के पास पैसों की कोई कमी तो थी नहीं। वो एक छोड़ो कई ऐसे नौकर रख सकते थे। नौकर के पास बस एक ही काम था। सुबह दूध वाले से दूध लेना और दोपहर को दादा जी के सोने से पहले उनको दूध गरम करके पिलाना। नौकर के भी मजे थे , इस एक काम के इलावा वो पूरे दिन खाली था और खाली रहने की तनख्वाह टाइम पर मिल जाती थी।
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एक महीना सब कुछ ठीक ठाक चला। अब नौकर की जात से ईमानदारी की उम्मीद भी कहाँ रखी जा सकती थी। जब से वह आया था , घरवालों ने भो दादा जी की दूध की समस्या पर ध्यान देना बंद कर दिया था। घर में कोई ऐसा ना था जो नौकर पर नजर रखता , सो अब नौकर ने एक पाव दूध खुद पीना शुरू कर दिया और एक पाव पानी मिलाकर दादा जी को देना शुरू कर दिया। शुरू में तो दादा जी को लगा की दूधिया ही गलत दूध दे रहा है शायद, पर धीरे धीरे उनके शक की सुई नौकर की तरफ ही जाती रही , अब शक की कोई दवा तो होती नहीं। पर अब समस्या यह थी कि , किया क्या जाये। यदि दूसरा नौकर भी रखा गया तो वो भी यही करेगा , तब क्या करेंगे।
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आख़िरकार दादा जी ने एक नौकर और रख लिया। उनका मानना था कि दोनों नौकर एक दूसरे पर नजर रखेंगे और उनको शुद्ध दूध पीने के लिए मिलेगा। कुछ दिन तो सब ठीक लगा। दोनों नौकर एक दूसरे से डरते थे और दादा जी को शुद्ध दूध पीने को मिलता था। पर नौकर की जात का कोई भरोसा नहीं किया जा सकता। दोनों मिल गए और अब आधा किलो दूध दोनों नौकर मिलबांट कर पीने लगे और बाकी आधा किलो में आधा किलो पानी मिलाकर दादा जी को देने लगे। दादा जी का माथा फिर खटका। एक और नौकर रख लिया गया , उन दोनों नौकरों पर नजर रखने के लिए। कुछ दिन सब ठीक चला पर जल्दी ही तीनों नौकर मिल गए और तीन पाव दूध पीने लगे और दादा जी को मिलता एक पाव दूध और तीन पाव पानी। दादा जी को लगा कि अब तो हद ही हो गयी और उन्होंने एक चौथा नौकर और रख लिया , तीनो नौकरों पर नजर रखने के लिए।
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कुछ दिन सब ठीक चला और आख़िरकार वह दिन आ ही गया जब चारों नौकर मिल गए और चारों मिलकर एक एक पाव दूध पी गए, सारा का सारा दूध खत्म हो गया और दादा जी को पिलाने के लिए उनके पास कुछ नहीं बचा। अब चारों दादा जी के सोने का इंतजार करने लगे। काफी इंतजार के बाद भी जब दूध न आया तो इन्तजार करते करते दादा जी की आँख लग गयी। नौकर तो बस इसी इंतजार में थे। दादा जी के सोते ही उन्होंने दादा जी के होठों पर गाढ़ी गाढ़ी मलाई लगा दी। जब दादा जी सोकर उठे तो उनको दूध की हुड़क हुई। उन्हें याद आया कि आज तो नौकरों ने उन्हें दूध दिया ही नहीं। उन्होंने फौरन नौकरों को आवाज लगाई। चारों नौकर तुरंत भागे भागे आ गए। बदमाशों , तुमने मुझे आज दूध नहीं पिलाया , दादा जी ने बहुत गुस्से में नौकरों से कहा। नहीं हुजूर , हमने आपको दूध दिया था, सोने से जरा पहले ही आपने दूध पिया था , यकीन न हो तो आप शीशे में देख लीजिये, आपके मुँह पर मलाई अभी भी लगी हुई है, आप इतनी नींद में थे की होठों पर से मलाई हटाना भी भूल गए , नौकरों ने कहा। नौकरों का इतना आत्मविश्वास देखकर दादा जी को भी मजबूरन शीशे में देखना पड़ा। बड़ी गाढ़ी मलाई थी उनके होठों पर। अब तो उनको मलाई की सुगंध भी आनी शुरू हो गयी थी। भाई वाह , आज कई दिनों बाद इतना गाढ़ा दूध पिया है मैंने , सोच सोच कर ही दादा जी को बहुत अच्छा लग रहा था। आज नौकर रखने का उनका निर्णय सही साबित हो गया था। आज दादा जी के शक का तसल्लीबक्श इलाज हो चुका था , उनके शक की दवा उनके होठों पर ही लगी हुई थी ।
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