हिंदी कहानी - गधे से आदमी बनाना (Hindi Story - To make man from donkey)

एक बार एक अनपढ़ गरीब बुढ़िया एक अध्यापक के घर के बाहर से गुजर रही थी। अंदर गुरु जी बच्चों को पढ़ा रहे थे। उनका एक शरारती बच्चा बहुत ऊधम कर रहा था।  गुरु जी उस ऊधमी शिष्य की पिटाई कर रहे थे और कह रहे थे , "सुधर जा , वरना तेरे जैसे बहुत मैंने गधे से आदमी बनाये हैं " । बाहर खड़ी बुढ़िया के कान गुरु जी की बात सुनकर खड़े हो गए और वो सोचने लगी । उसका कोई बेटा न था। इस उम्र में भी उसको और उसके पति को कमाना पड़ता था। कितना अच्छा हो कि ये गुरु जी उनके गधे को आदमी बना दें और वो उनका बेटा बनकर उनकी सेवा करे। उनको कमाना न पड़े। वो अपने बेटे की शादी बड़ी धूम धाम से करें। उनकी बहू उनकी खूब देखभाल करे। यही सपने लेते हुए बुढ़िया के कदम गुरु जी के दरवाजे की और बढ़ चले।

To make man from donkey


बुढ़िया घर के अंदर गयी और उसने गुरु जी को दोनों हाथ जोड़कर प्रणाम किया।  यूँ इस तरह एक गरीब बूढी बुढ़िया को कक्षा में आया देखकर गुरूजी हैरानी से उसकी ओर देखने लगे। बुढ़िया ने बोलना शुरू किया , "गुरु जी , मैं अभी अभी यहाँ से गुजर रही थी कि मैंने सुना कि आप गधे को आदमी बनाते हैं। मेरे पास भी एक गधा है। यदि आप उसे भी गधे से आदमी बना दें तो आपकी बहुत कृपा होगी। वह हमारा बेटा बनकर हमारी बुढ़ापे की लाठी बनेगा। इसके लिए आप जो कहेंगे मैं आपको देने को तैयार हूँ। " गुरु जी समझ गए की उनका एक बेअक्ल बुढ़िया से वास्ता पड़ा है। गुरु जी बोले , "ठीक है , लेकिन गधे से आदमी बनाने का मेरा शुल्क बहुत अधिक है , शायद आप ना दे सको। " बुढ़िया बोली , "आप बस खर्चा बताइये , मैं और मेरे पति मिलकर कहीं से भी उसका इंतजाम कर लेंगे , आप उसकी चिंता न करें , अभी तो हमारे हाथ पैर चलते है , और फिर वो आदमी बनकर सेवा भी तो हमारी ही करेगा। " बुढ़िया का संकल्प देखकर गुरु जी समझ गए कि उसको बेवकूफ बनाना आसान है और बोले , " सुनो , मेरी फीस (शुल्क) दस हजार रुपए महीना होगी और पांच हजार रुपए गधे के खाने पीने के अतिरिक्त देने होंगे। उसके अलावा २ किलो देसी घी , २ किलो बादाम और २ किलो काजू  हर हफ्ते। क्या कर पाओगी इतना खर्चा ? अगर कर पाओ तो अपने गधे को कल ही दस साल के लिए मेरे पास छोड़ जाओ। " बुढ़िया बोली , "दस साल तो बहुत अधिक है। " गुरु जी बोले , "तो फिर काम भी तो  मुश्किल है , गधे से आदमी बनाना है , कोई एक दिन का काम तो है नहीं।  और सुनो , तुम्हें भी बार बार आकर मिलने की इजाजत नहीं होगी , वरना बार बार तुम्हें देखकर उसको पिछली बातें याद आती रहेंगी और वो आदमी न बन सकेगा। " बुढ़िया ने समझकर हामी भर दी और चली गयी।

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अगले ही दिन बुढ़िया अपने पति के साथ आयी और अपने गधे को सरे खर्चे पानी के साथ गुरु जी के पास छोड़ गयी। बुढ़िया और उसका पति खूब मेहनत करते और समय पर गुरु जी को उनका खर्चा पहुंचाते। गुरु जी की तो पांचो उँगलियाँ घी में और सिर कढ़ाई में। गुरु जी की जिंदगी ऐश से कटने लगी। खर्चे के पैसे और खाने पीने का सामान बुढ़िया दे जाती थी और सामान ढोने के लिए मुफ्त का गधा अलग मिल गया था। गधा तो आदमी नहीं बन रहा था पर गुरु जी जरूर मोटे होते जा रहे थे। एक साल बाद बुढ़िया आयी और उसने देखा उसका गधा वैसा का वैसा ही बंधा हुआ है और किसी भी तरह से उसमें आदमी बनने के लक्षण नजर नहीं आ रहे थे। उसने एक चिठ्ठी गधे के सामने रख दी और उसे पढ़ने के लिए कहने लगी। गुरु जी ने देखा तो तुरंत हस्तक्षेप करते हुए बोले , " अरे इतनी जल्दी थोड़े ही वो पढ़ना लिखना सीखेगा , उसमें तो वक्त लगेगा , असली फर्क तो आपको दसवें साल में ही नजर आएगा। " बुढ़िया बेचारी के पास गुरु जी की बात मानने के सिवा कोई चारा न था। बुढ़िया अपने घर लौट गयी।

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इसी प्रकार नौ वर्ष बीत गए।  गुरु जी ने गधा बेच दिया और पैसे खा गए।  बुढ़िया और उसका पति अपने पढ़े लिखे बेटे (गधे) से मिलने के लिए बहुत उत्साहित थे। वो नियत समय पर गुरु जी के पास पहुंच गए , किन्तु उनको वहां उनका गधा दिखाई नहीं दिया। बुढ़िया और उसके पति को आया जानकर , गुरु जी बाहर आ गए और बोले , " अरे आपने आने में बहुत देर कर दी , आपका गधा तो बहुत होनहार निकला , समय से पहले ही आदमी बन गया और उसे तो बहुत ही ऊँचे दर्जे की नौकरी भी मिल गयी है उसे । जिला न्यायलय में न्यायधीश बन गया है आपका गधा। " सुनकर बुढ़िया और उसके पति का चेहरा खिल उठा।  यह तो सोने पे सुहागा हो गया।  उनके गधे की इतनी अच्छी नौकरी भी लग गयी। वो भागे भागे जिला न्यायालय पहुँच गए। वहाँ न्यायालय में न्यायधीश मुकदमे की सुनवाई कर रहा था।  दोनों दरवाजे पर खड़े  हो गए और इशारे से न्यायधीश का  ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने लगे। उनके इशारे से न्यायधीश का ध्यान भंग होने लगा और उसने क्रोध में अपने संतरी को बुढ़िया और उसके पति को वहां से हटाने का आदेश दिया। न्यायधीश का आदेश मिलते ही पुलिसवालों ने बुढ़िया और उसके पति को धक्के मारकर वहां से हटा दिया।

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वो निराश होकर गुरु जी के पास लौट आये और उन्होंने गुरु जी को पूरा किस्सा सुनाया। गुरु जी सोच में पड़ गए। उन्होंने बुढ़िया से पूछा कि क्या उन्होंने न्यायधीश को घास दिखाई थी। यदि घास दिखाई होती तो अवश्य ही न्यायधीश में गधे वाली प्रवृति जाग गयी होती और उसने उन्हें पहचान लिया होता। बुढ़िया और उसके पति को गुरु जी की यह बात जँच गयी और वो फिर पहुंच गए न्यायलय।  वहां पहुंचकर उन्होंने एक बार फिर इशारों से न्यायधीश का ध्यान आकर्षित करना शुरू कर दिया और घास भी दिखाने लगे। न्यायधीश को बहुत गुस्सा आ गया उसने उन्हें धक्के मारकर न्यायालय से निकालने का आदेश दे दिया। धक्के खाकर वो फिर गुरु जी के पास पहुंच गए और उनको सारी बात बताई। गुरु जी ने सांत्वना देते हुए कहा कि , "इसमें मैं कुछ नहीं कर सकता , अच्छी पढ़ाई और अच्छी नौकरी मिलते ही तुम्हारे बेटे (गधे) ने तुम्हें पहचानने से मना कर दिया तो इसमें अचरज की कोई बात नहीं , आजकल तो अच्छी नौकरी मिलते ही अपना सगा बेटा भी आँख फेर लेता है , वो तो फिर भी गधा है। बुढ़िया और उसका पति अपना से मुँह लेकर रह गए।

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