चालीस साल की तपस्या का मोल
एक बार विवेकानंद जी भ्रमण करते हुए एक साधु की कुटिया में पहुंचे। साधु और उनमें अभिवादन का आदान प्रदान हुआ और फिर ज्ञान की चर्चा चल पड़ी। बातों ही बातों में विवेकानंद जी ने साधु बाबा से पूछ लिया कि वे कितने वर्ष से तपस्या कर रहे हैं। साधु ने बड़े ही गर्व से उत्तर दिया कि उसे तपस्या करते करते पूरे चालीस वर्ष हो चुके हैं। तब विवेकानंद जी ने पूछा कि चालीस वर्ष की तपस्या से उन्होंने क्या हासिल किया। साधु ने दुबारा बड़े ही गर्व से उत्तर दिया , "पुत्र यह जो नदी तुम मेरी कुटिया के सामने से बहते देख रहे हो , उसको मैं चलकर पार कर सकता हूँ , यह बल मैंने अपनी तपस्या से अर्जित किया है। " यह सुनकर स्वामी विवेकानंद जी बोले , "तब तो महाराज आपकी चालीस साल की तपस्या का मोल केवल 2 पैसे ही है , क्योंकि केवल 2 पैसे देकर कोई भी व्यक्ति इस नदी को नाव द्वारा पार कर सकता है। " विवेकानंद जी की बात सुनकर साधु बाबा निरुत्तर हो गए।शायद आप पढ़ना चाहें : हिंदी कहानी - जब रातों रात एक पूरा जंगल ही उग गया ( Hindi Story - When a forest appeared overnight)
बसे रहो , उजड़ जाओ
एक बार गुरु नानक देव जी घूमते हुए एक गाँव में पहुंचे। वहां के लोग बहुत उद्दंड थे। उन्होंने गुरु नानक देव जी का स्वागत भी नहीं किया और वे लोग बहुत झगड़ालू भी थे तथा उनकी भाषा भी बहुत अभद्र थी। यह सब देखकर गुरु जी ने उन्हें आशीर्वाद दिया , "बसे रहो " और वहां से चले गए। कुछ दिन बाद गुरु जी एक ऐसे गाँव में पहुंचे जहाँ के लोग बहुत ही सज्जन थे , वे लोग आपस में झगड़ा ना करके बातचीत से अपने मतभेद सुलझाया करते थे और अभद्र भाषा का प्रयोग बिलकुल नहीं किया करते थे। उन्होंने गुरु नानक देव जी को आया देखकर उनका स्वागत सत्कार किया और उनके प्रवचनों को भी बड़े ही ध्यान से सुना। गुरु जी जब वहां से जाने लगे तो उन्होंने उन्हें आशीर्वाद दिया "उजड़ जाओ। " यह देखकर गुरु जी के शिष्यों को बहुत आश्चर्य हुआ और उन्होंने गुरु जी से पूछा कि उन्होंने बुरे लोगों को बसे रहने और अच्छे लोगों को उजड़ जाओ का आशीर्वाद क्यों दिया। तब गुरु जी ने बताया कि बुरे लोग जहाँ भी जायेंगे बुराई ही फैलाएंगे और अच्छे लोग जहां भी जायेंगे अच्छाई ही फैलाएंगे, इसीलिए उन्होंने बुरे लोगों को बसे रहने का आशीर्वाद दिया जिससे बुराई न फैले और अच्छे लोगों को उजड़ने का आशीर्वाद दिया जिससे अच्छाई फैले। शिष्य गुरु जी से ज्ञान की बातें सुनकर धन्य हो गए।शायद आप पढ़ना चाहें : हिंदी कहानी - गधे से आदमी बनाना (Hindi Story - To make man from donkey)
जब एक बुढ़िया ने शिवाजी महाराज को रणनीति समझाई।
एक बार शिवाजी महाराज अपने सहयोगियों के साथ कहीं जा रहे थे। रास्ते में रात हो गयी। रात में यात्रा ना करने का निर्णय लेते हुए उन्होंने पास के गाँव में ही रात गुजारने का निश्चय किया। उन्होंने एक घर का दरवाजा खटखटाया , तो उसमें से एक बुढ़िया निकली। शिवाजी के एक सहयोगी ने बुढ़िया से कहा , "माई हम पथिक हैं और रात गुजारने के लिए आश्रय चाहते हैं।" बुढ़िया ने उन्हें कुटिया के अंदर बुला लिया और बैठने के लिए आसान प्रदान किया। उनकी थकान मिटने के पश्चात् बुढ़िया ने उन्हें भोजन के लिए आग्रह किया। भोजन में बुढ़िया ने उन्हें दाल और चावल परोसे। शिवाजी ने चावलों में दाल डाली और जब चावलों के बीच में हाथ डालकर चावल दाल उठाने लगे तो उनका हाथ गरम दाल चावल की वजह से जल गया। यह देख बुढ़िया हंसने लगी और बोली , " तू बिल्कुल शिवाजी की तरह ही मूर्ख है। " शिवाजी बुढ़िया की बात सुनकर चौंक गए। उन्होंने बड़े ही विनम्र स्वर में बुढ़िया से पूछा , "माता आपने ऐसा क्यों कहा। " बुढ़िया बोली , "मैंने ऐसा इसलिए कहा क्योंकि , जिस प्रकार शिवाजी बिना कुछ सोचे समझे शत्रु के केंद्रीय गढ़ो पर आक्रमण करता है और भले ही वो गढ़ जीत जाये पर पर इस प्रक्रिया में अपना बहुत नुकसान कर लेता है , उसी प्रकार तूने भी चावल और दाल को ठीक बीच में से खाने का प्रयत्न किया , जहाँ वो सबसे अधिक गरम होते हैं और अपना हाथ जला लिया। हमेशा गरम दाल चावल को पहले किनारों पर से खाना चाहिए जहाँ वो ठन्डे होते है और फिर धीरे धीरे केंद्र की ओर बढ़ना चाहिए उसी प्रकार शिवाजी को भी पहले शत्रु के बाहरी किलों पर पहले आक्रमण करना चाहिए जहाँ शत्रु की शक्ति क्षीण होती है और फिर धीरे धीरे आंतरिक गढ़ों की ओर बढ़ना चाहिए। " शिवाजी को बुढ़िया के मुख से ये सुनकर अपनी गलती का अहसास हुआ और उसके बाद उन्होंने अपनी युद्ध नीति ही बदल दी।शायद आप पढ़ना चाहें : हिंदी कहानी - शक की कोई दवा नहीं होती (Hindi Story - There is no medicine for doubt)
महाराजा रणजीत सिंह
एक बार महाराजा रणजीत सिंह बगीचे में टहलते हुए अपने मंत्रियों के साथ कुछ मंत्रणा कर रहे थे। तभी एक पत्थर आकर उनके चेहरे पर लगा। पत्थर का वेग इतना तेज था कि उनके चेहरे से खून की धार बह निकली। यह देख उनके सहयोगियों के पसीने छूट गए और तुरंत ही सभी सहयोगी सैनिकों के साथ चारों ओर फैल गए उस पत्थर मारने वाले को पकड़ने के लिए। शीघ्र ही उन्होंने एक बुढ़िया को महाराजा रणजीत सिंह के सामने प्रस्तुत किया। बुढ़िया अपने आपको महाराज के सामने और सिपाहियों के घिरा पाकर असहज महसूस कर रही थी और जब उसको पता लगा कि उसका फेंका हुआ पत्थर महाराजा रणजीत सिंह को लगा है तो वह बेहद डर गयी और गिड़गिड़ाते हुए महाराजा रणजीत सिंह से बोली कि वो कई दिन से भूखी थी और इसीलिए उसने पेड़ से फल तोड़ने के लिए पेड़ पर पत्थर मारा था जो गलती से महाराज को जा लगा। यह देखकर महाराजा रणजीत सिंह ने उसे बहुत सारी भोजन सामग्री देकर विदा किया। यह देखकर महाराजा रणजीत सिंह के सहयोगियों ने उनसे पूछा कि उन्होंने बुढ़िया को पत्थर मारने का दंड क्यों नहीं दिया तो उन्होंने कहा कि जब एक पेड़ पत्थर मारने पर फल दे सकता है तो मैं महाराजा होकर पत्थर मारने वाले को खाना क्यों नहीं दे सकता। उनकी बात सुनकर उनके सहयोगी उनके समक्ष नतमस्तक हो गए।शायद आप यह भी पढ़ना चाहें :
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