क्या वास्तव में सिकंदर ने पोरस को हराया था ? (Did really Alexander defeated Porus?)

Did really Alexander defeated Porus


क्या वास्तव में सिकंदर ने पोरस को हराया था ? (Did really Alexander defeated Porus)

आइये आज कुछ इतिहास के पन्ने पलटते हैं।  चलते हैं आज से लगभग २४०० वर्ष पूर्व , जब एक आक्रांता सिकंदर भारत के दरवाजे पर खड़ा था। वो उसके हिसाब से पूरी दुनिया को जीतता हुआ आया था और भारत उसकी जीत का आखिरी मील का पत्थर साबित होने वाला था।  परन्तु भारत के एक बहुत ही छोटे से राज्य पौरव राष्ट्र , जिसको शायद उस समय और आज भी भारत के नक़्शे पर ढूढ़ना मुश्किल है, उसके राजा महान पौरस ने बैरंग डाक की तरह हरा कर भेजा था।

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अब आप में से 80 - 90 प्रतिशत लोग मेरी बात से सहमत नहीं होंगे और वो कहेंगे कि यह तो गलत है , असलियत में तो सिकंदर महान ने पौरस को हराया था।  इसमें उनका कोई दोष नहीं है , क्योंकि हमें बचपन से हमारी ही किताबों में पढ़ाया गया है और फिल्मों और सीरियल में दिखाया गया है की महान सिकंदर ने पौरस को हराया था। और फिर हमारा इतिहास तो अंग्रेजों ने लिखा है। हमने तो कभी अपने इतिहास को लिखने या परिभाषित करने की कभी कोशिश नहीं की। हमें क्या फर्क पड़ता है अगर अंग्रेजों ने पौरस को इतिहास में हरा दिया। हम तो वसुधैव कुटुंबकम वाले लोग हैं। पूरी दुनिया ही हमारा परिवार है। तो अंग्रेज भी हमारे परिवार के हैं और सिकंदर भी। जी हाँ , जो समाज 70 साल में भी अंग्रेजी का बोझ नहीं उतार पाया उसको क्या फर्क पड़ता है।  जो समाज अपनी संस्कृति छोड़कर पाश्चात्य संस्कृति को ग्रहण करना आधुनिकता मानता है उसे क्या फर्क पड़ता है। जहाँ के लोग कालिदास से ज्यादा शेक्सपीयर के बारे में जानते हैं उनको क्या फर्क पड़ता है। जहाँ के लोग कालिदास को शायद अकबर का नवरत्न बताएं , उनको क्या फर्क पड़ता है। जहां , तक्षशिला कहाँ था , इसका उत्तर बिहार मिले , क्योंकि लोगों को तक्षशिला और नालंदा में अंतर नहीं पता , उनको क्या फर्क पड़ता है। किसी ने ठीक ही कहा है :

जिसको न निज गौरवतथा निज देश का अभिमान है।
वह नर नहीं , नर पशु निरा है और मृतक के समान है।

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बचपन में बड़ा ही लोमहर्षक लगता था , यह सुनकर कि पौरस को हराने के बाद जब बंदी बनाकर लाया गया तो सिकंदर ने उससे पूछा कि बोल तेरे साथ क्या सलूक किया जाए , मार दिया जाए कि छोड़ दिया जाये , और पौरस ने बड़ी ही बहादुरी के कहा कि , वही सलूक किया जाए जो एक राजा को दूसरे राजा के साथ करना चाहिए। सच में रोंगटे खड़े हो जाते थे ये कहानी सुनकर और पढ़कर। इस कहानी में सिकंदर को एक महान राजा बताया गया है और पौरस को साधारण।  तब ये एक कहानी थी , पर जब इस कहानी को तर्कों की कसौटी पर कसा तो इसमें कई खामियां निकली। साक्ष्य तो हमारे पास नहीं हैं और निश्चित ही इतिहासकारों के पास भी बहुत ज्यादा नहीं रहे होंगे , पर तर्कों के आधार पर इस ब्लॉग पोस्ट में हमने यह बताने का प्रयत्न किया है कि कैसे हमारे इतिहास को तरोड़ मरोड़ कर लिखा गया है और हमारी शिक्षा के माध्यम से हमारे दिमाग में फिट किया गया है। जिनको मेरे तर्क समझ में आ जाएं , उनको धन्यवाद , और जिनको अच्छे न लगें तो क्या फर्क पड़ता है।

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आइये क्रमबद्ध तरीके से एक एक पहलू का विश्लेषण करते हैं। सबसे पहले तो आपको बता दें कि एलेग्जेंडर को फारस में सिकंदर कहा जाता था और क्योंकि भारत और फारस के व्यापारिक रिश्ते बहुत मजबूत थे तो फारस का शब्द सिकंदर भारत में भी प्रचलित हो गया।

पहले कुछ ऐसे तथ्य जो इतिहासकारों ने हमें बताये :

1.  इतिहासकार लिखते हैं कि पौरस से युद्ध में सिकंदर को काफी हानि हुई थी, उसकी सेना के हौसले पस्त हो गए थे, उसके सैनिक थक चुके थे और घर वापस लौटना चाहते थे। पौरस से युद्ध में सिकंदर की काफी हानि हुई थी , यह बात तो ठीक है पर जीतने के बाद उसकी सेना के हौसले पस्त हो गए थे यह बात हजम नहीं होती क्योंकि जीत कैसे भी मिले हमेशा हौसले बढाती है। हौसले पस्त तो तभी हो सकते हैं जब सिकंदर की हार हुई हो पौरस के हाथों। सिकंदर के सैनिक थक गए थे और वो वापस घर लौटना चाहते थे , यह बात तब हजम नहीं होती जब सिकंदर की जीत हुई हो क्योंकि यदि जीत सिकंदर की हुई होती तो पौरव राष्ट्र और तक्षशिला , दो राज्य उसके आधीन थे और इन राज्यों में सिकंदर के सैनिकों की थकान मिटाने के पर्याप्त साधन थे। मुझे लगता है उनकी थकान और निराशा उनकी हार के कारण थी वार्ना दस साल ने घर से दूर रह चुके सैनिकों को अचानक घर याद आ गया और वो भी तब जब एक ओर राज्य मगध को हराते ही उनका विश्व विजय का ख्वाब पूरा होने वाला था क्योंकि भारत ही उनकी आखिरी मंजिल थी।

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2. इतिहासकार यह बताते है कि सिकंदर की सेना पौरस की सेना में हाथियों को देखकर डर गयी थी और मगध की सेना में हजारों हाथी थे इसलिए सिकंदर की सेना ने आगे बढ़ने से मना कर दिया। अब यह बात तो बिल्कुल हजम नहीं होती क्योंकि वही इतिहासकार यह भी बताते हैं कि सिकंदर की सेना ने हाथियों की आँखों को भालों से फोड़कर , उनको अँधा करकर पौरस की सेना के हाथियों को एक ऐसे शस्त्र के रूप में बदल दिया था जो अँधा होने के बाद दोनों ही सेनाओं के लिए खतरनाक थे। तो फिर अचानक उस महान सिकंदर को मगध के हाथियों से क्यों डर लग गया ?

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3. इतिहासकार यह बताते है कि सिकंदर पौरस की बहादुरी देखकर बहुत प्रभावित हुआ इसलिए उसने पौरस को जीवित छोड़ दिया और उसका राज्य भी लौटा दिया। जिस सिकंदर ने मेसिडोनिआ की सत्ता हासिल करने के लिए अपने पिता फिलिप और अपने भाई को मार दिया , जिस सिकंदर ने मात्र बहस होने पर अपने वफादार मित्र सिलिटस को मार दिया। जिस सिकंदर ने हर उस राजा को या तो युद्ध में मार दिया या हारने के बाद बंदी बनाकर मार दिया , जिसने भी उससे युद्ध किता , उस सिकंदर को अचानक पौरस में इतनी बहादुरी दिखाई की उसने न केवल पौरस को जीवित छोड़ दिया बल्कि उसके साथ साथ उसने आगे बढ़ने का ख्वाब भी छोड़ दिया। चलो एक मिनट के लिए मान भी लेते हैं की सिकंदर को पौरस की बहादुरी देखकर उस पर दया आ गयी और उसने पौरस को छोड़ भी दिया , तब भी यह बात समझ में नहीं आती की उसने मगध पर आक्रमण क्यों नहीं किया जबकि अब तो तक्षशिला के साथ साथ पौरव राष्ट्र भी उसके साथ था।

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आइये कुछ नए पहलुओं पर भी ध्यान देते हैं जो अंग्रेजी इतिहासकारों ने शायद जानबूझकर छोड़ दिए :

1. युद्ध के बाद दोनों राजा जीवित थे : यह बहुत महत्वपूर्ण बात है। युद्ध के बाद दोनों राजाओं का जीवित होना एक ही स्तिथि में संभव है की जीत भारतीय राजा की हुई हो। क्योंकि सिर्फ भारतीय राजाओं को ही हारे हुए जीवित प्रतिद्वंदी को छोड़ने , उसका राज्य वापस लौटाने या उसको सुरक्षित वापस लौटने देने की बीमारी थी। यह केवल भारत की संस्कृति की विशेषता है। भारत के अतिरिक्त विश्व में कहीं भी ऐसे उदहारण नहीं मिलेंगे। पृथ्वीराज चौहान द्वारा कई बार मोहम्मद गौरी को जीवित छोड़ने और वापस जाने देने का उदहारण शायद सबको मालूम है। यह कारनामा पृथ्वीराज चौहान को कितना भारी पड़ेगा उसको नहीं मालूम था उसी प्रकार पौरस को भी नहीं मालूम था की उसकी सिकंदर को जीवित वापस जाने देने की बीमारी को अंग्रेज इतिहासकार नहीं समझ पाएंगे और उसको उल्टा पौरस की हार के रूप में दिखाएंगे , जिसको उसके अपने देश वाले भी मान लेंगे।

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2. सिकंदर जिस रास्ते से आया था उससे वापस नहीं गया : यदि आप थोड़ा सा भी गूगल करेंगे तो पाएंगे की जहाँ सिकंदर का आना हिन्दुकुश से हुआ और जाना ईरान के शहर जेड्रोसिया की ओर से जो की भारत के राजस्थान  और गुजरात के बाहरी ओर से और समुन्द्र के साथ से होते हुए जाता था। निश्चित रूप से सिकंदर के लिए एक नया और मुश्किल रास्ता था। अब सोचने की बात यह है कि कोई राजा अपनी थकी हुई सेना जो जल्दी से जल्दी घर पहुंचना चाहती है उसे नए , मुश्किल और लंबे रास्ते से क्यों ले जायेगा जबकि उसके पीछे पूरा उसका जीता हुआ इलाका पड़ा था जहाँ से वो अपनी सेना को आराम से सुख सुविधा पूर्वक वापस ले जा सकता था। ऐसा तभी हो सकता है जब जीतने वाले राजा पौरस ने उसे नए रास्ते से वापस जाने के लिए मजबूर किया हो क्योंकि पौरस जानता था की यदि सिकंदर उस रास्ते से वापस जायेगा जिसे वो जीतता हुआ आया है तो वो अवश्य ही अपनी शक्ति एकत्रित करके दुबारा आक्रमण कर सकता है इसलिए उसने सिकंदर को अपनी सेना सहित वापिस जाने के लिए हिन्दुकुश से वापस जाने की अनुमति नहीं दी।

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3. सिकंदर मच्छर के काटने से मलेरिया होने से नहीं बल्कि पौरस द्वारा युद्ध में दिए गए घावों से मरा था : अब यदि आप मेरे ऊपर दिए तर्कों से सहमत हैं तो इस बात से भी सहमत हो जायेंगे कि सिकंदर मच्छर के काटने से मलेरिया होने से नहीं बल्कि पौरस द्वारा युद्ध में दिए गए घावों से मरा था क्योंकि मुझे नहीं लगता कि मलेरिया दुनिया में सिकंदर को ही सबसे पहले हुआ होगा और यूनान जैसी सभ्यता जो विश्व विजय की कामना रखती होगी उसके वैद्यों को उस समय के अनुसार मलेरिया का प्रचलित इलाज ना मालूम हो। मच्छर से सिकंदर की मौत दिखाना कुछ ऐसा लगता है जैसे इतिहासकारों ने पौरस के हाथों सिकंदर को मिली शर्मनाक हार पर पर्दा डाला हो।

खैर जिसे मानना है वो माने और जिसे नहीं मानना है वो ना माने , पर हम तो सिकंदर की बजाए पौरस को महान  कहना अधिक सही मानेंगे।

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