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परिवर्तन संसार का नियम है (Change is the evidence of life)

Change is the evidence of life

मित्रो , एक पुरानी कहावत है कि परिवर्तन संसार का नियम है।  आज मैं इस ब्लॉग पोस्ट में कई ऐसे प्रोडक्ट्स (उत्पादों) के उदाहरण के माध्यम यह दिखाना चाहूंगा , कि कैसे कभी संसार के शीर्ष पर रहे प्रोडक्ट , आज समय की नब्ज नहीं समझ पाए और समय के साथ बदलती परस्तिथियों के अनुसार नहीं बदल , जिससे या तो वो संसार से लगभग गायब हो गए या अपने शीर्ष से नीचे लुढ़क गए। याद रखिये जो फल पकने के बाद भी पेड़ पर लगे रह जाते हैं , वो और अधिक मीठे नहीं होते, बल्कि सड़ जाते हैं और एक जगह पड़े पानी में काई लग जाती है जबकि बहता पानी अधिक स्वच्छ रहता है।

आइये उदाहरणों की मदद से यह समझते हैं।

स्विज़रलैंड की घड़ियाँ

साठ के दशक में स्विज़रलैंड की घड़ियाँ पूरी दुनिया पर राज करती थीं। ऐसा लगता था कि शायद घड़ियों के बाजार पर हमेशा स्विज़रलैंड का ही राज रहेगा। पर स्विज़रलैंड की घड़ी उत्पादक कंपनियां बदलते वक्त और करवट लेती टेक्नोलॉजी को नहीं समझ पाईं और 80 के दशक में टिक टिक करती घड़ियों को एल सी डी डिस्प्ले वाली जापानी क्वार्ट्ज़ (quartz) घड़ियों ने न केवल कड़ी टक्कर दी बल्कि कुछ समय के लिए तो लगभग लुप्त ही कर दिया था। उसके बाद जितनी भी टिक टिक घड़ियों की वापसी हुई वो टाइम देखने के लिए कम और टशन या स्टेटस सिंबल के लिए ज्यादा हुई , जैसे कभी हमारी शर्ट की जेबें नीले करने वाले फाउंटेन पेन आजकल बहुत महंगे होकर अमीरों की जेबों में अमीरी का स्टेटस सिंबल बन गए है , भले ही उनका इस्तेमाल दिन में शायद चार बार साइन करने के सिवा कुछ और न हो। चलिए घड़ियों की बात पर वापस आते हैं। भारत में भी यही कहानी घटी और केवल टिक टिक घड़ियां बनाने वाली एच एम टी कंपनी अपने आप को ना बदल पाने की वजह से टाइटन की क्वार्ट्ज़ घड़ियों को टक्कर न दे सकी और लगभग लुप्त हो गयी।

जापानी क्वार्ट्ज़ (quartz) घड़ियाँ

अस्सी और नब्बे के शुरुआती दशक में राज करने वाली क्वार्ट्ज़ घड़ियाँ भी अपना शीर्ष स्थान कायम नहीं रख पायीं क्योंकि वो भी आगे बढ़ती कंप्यूटर टेक्नोलॉजी को नहीं भांप पायी और तब तो क्वार्ट्ज़ घड़ियाँ बिलकुल गायब हो गईं जब माइक्रोसॉफ्ट विंडोज 95 (Microsoft Windows 95) के आने के बाद हमारे चारों ओर कम्प्यूटरों की भरमार होने लगी और हर कंप्यूटर में दायीं और नीचे के तरफ घड़ी उपलब्ध थी। इसके बाद लोगों का टाइम देखने का तरीका बदलने लगा और लोग टाइम जानने के लिए कलाई की ओर न देखकर कंप्यूटर की ओर देखने लगे।


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माइक्रोसॉफ्ट विंडोज (Microsoft Windows)

एक समय पर एप्पल मैकिनटोश को हाँशियें पर धकेल कर दुनिया पर राज करने वाला माइक्रोसॉफ्ट विंडोज भी दुनिया में अपनी स्तिथि कायम नहीं रख पाया और यहाँ दूसरे प्रोडक्ट या तो बाजी मार ले गए या कड़ी टक्कर देने लगे। यहाँ लड़ाई थोड़ी अलग तरह की थी। आइये देखते हैं कि क्या और कैसे हुआ।

इसमें कोई शक नहीं कि माइक्रोसॉफ्ट ने एक बेहतरीन ऑपरेटिंग सिस्टम (operating system) तैयार किया था , या शायद सबसे अच्छा। पर शायद माइक्रोसॉफ्ट को लगा कि कम्प्यूटर्स (computers) ही दुनिया पर हमेशा राज करते रहेंगे और शायद  स्मार्टफोन्स (smartphones) के आने की पदचाप माइक्रोसॉफ्ट सुन नहीं पाया और जल्दी ही मुकाबले का मैदान ही बदल गया। दुनिया भर में मोबाइल , कम्प्यूटरों को हटा कर अपनी जगह बना रहे थे और गूगल अपने एंड्राइड (Android) ऑपरेटिंग सिस्टम द्वारा इस बदलाव का नेतृत्व कर रहा था। माइक्रोसॉफ्ट जिन सड़कों का विजेता था वो सड़कें बदल रहीं थीं और नई सड़कों के लिए तो माइक्रोसॉफ्ट ने गाड़ी डिज़ाइन ही नहीं की थी। कम्प्यूटर्स की दुनिया का विजेता मोबाइल की दुनिया में नदारद था। माइक्रोसॉफ्ट ने नोकिआ को खरीद कर मुकाबले में आने की कोशिश भी की पर तब तक बहुत देर हो चुकी थी।

उधर एक और परिवर्तन माइक्रोसॉफ्ट के लिए मुसीबत बनने वाला था और वो था , जिस एप्पल (Apple) को वो लैपटॉप्स (laptops) में पीछे छोड़ आया था , उसने मोबाइल की दुनिया में अपनी पहचान स्थापित कर ली थी। एप्पल का मोबाइल रखना अब एक स्टेटस सिंबल (status symbol) बन चुका था। एप्पल के मोबाइल के साथ साथ दुबारा उदय हुआ एप्पल लैपटॉप्स का। जो ऑपरेटिंग सिस्टम कभी इस कारण माइक्रोसॉफ्ट से पिछड़ गया था कि माइक्रोसॉफ्ट विंडोज ज्यादा यूजर फ्रेंडली (user friendly) था , वो दुबारा अपनी जगह बना चुका था।  अब एप्पल का लैपटॉप थोड़ा महंगा होते हुए भी बिक रहा था क्योंकि अब एप्पल का नाम एक स्टेटस सिंबल बन चुका था।

माइक्रोसॉफ्ट इंटरनेट एक्स्प्लोरर (Microsoft Internet Explorer)

एक समय में माइक्रोसॉफ्ट इंटरनेट एक्स्प्लोरर इंटरनेट ब्राउज़िंग (internet browsing) का पर्याय बन चुका था। माइक्रोसॉफ्ट ने विंडोज के साथ इसे फ्री देकर उस समय के बाकी ब्राउज़र (browsers) की दुकान बंद कर दी थी। पर माइक्रोसॉफ्ट के देखते देखते गूगल क्रोम (Google Chrome) आया और पता ही नहीं चला की कब इंटरनेट एक्स्प्लोरर, ब्राउज़िंग की दुनिया में हाशिये पर आ गया। इसके पीछे कुछ कारण थे। पहला कि गूगल क्रोम एक तेज ब्राउज़र (web browser) था और ज्यादा रेस्पॉन्सिव (responsive) था।  ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि गूगल ने कम इस्तेमाल होने वाले फीचर्स (features) , एक्सटेंशन्स (extensions) में दाल दिए जिससे बेसिक (basic) ब्राउज़र बेहद हल्का और फ़ास्ट (fast) हो गया। दूसरा कारण शायद यह रहा कि इंटरनेट एक्स्प्लोरर का डिफ़ॉल्ट होमपेज (default homepage) एम एस एन (msn) था जो लोड होने में क्रोम के डिफ़ॉल्ट होम पेज गूगल (google.com) के मुकाबले हैवी (heavy) था। फिर डिफ़ॉल्ट पेज में एम एस एन (msn) का खुलना किसी के लिए कोई महत्त्व नहीं रखता था जबकि डिफ़ॉल्ट पेज में एक सर्च इंजन का खुलना सबकी आवश्यकता थी।


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गूगल ऑरकुट (Google Orkut)

जिसने गूगल ऑरकुट का इस्तेमाल किया है , वो जनता है की गूगल ऑरकुट का कॉसेप्ट लगभग वैसा ही था जो फेसबुक का है , यानि कि सोशल नेटवर्किंग। यहाँ तक कि दोनों के बहुत सारे फीचर्स भी एक जैसे ही थे। गूगल का यह प्रोडक्ट ठीक ठाक पॉपुलर था। पर शायद गूगल के लिए ऑरकुट उनके बहुत सारे चलते हुए प्रोडक्ट्स में से एक था और फेसबुक के लिए फेसबुक उनका एकमात्र करो या मारो प्रोडक्ट था। और स्ट्रेटेजिक अंतर का असर जल्द ही दिखने लगा।  फेसबुक की लोकप्रियता बढ़ने लगी और वो जल्दी ही दुनिया की नंबर वन सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट बन गई। पर हैरानी तब हुई जब गूगल ने फेसबुक तो टक्कर देने की बजाय ऑरकुट को बंद करने का निर्णय लिए होता।  यदि गूगल ने ऑरकुट को बंद न करके फेसबुक को टक्कर देने की सोची होती तो शायद आज दुनिया के पास सोशल नेट्वोर्किंग के दो बेहतरीन प्लेटफार्म होते।

पेपाल (Paypal)

यदि आप आईटी इंडस्ट्री से हैं तो आपने पेपाल (Paypal) का नाम अवश्य सुना होगा। एक समय में पेपाल (Paypal) ने ईमेल से पैसे भेजने और मँगाने का बहुत ही बेहतरीन और सरल सिस्टम डिज़ाइन किया था और इसमें वो एक समय में शीर्ष पर था। भारत के आई टी वाले लोग जो फ्री लांसर का काम करते हैं उनके लिए तो पेपाल (Paypal) किसी वरदान से काम नहीं था।  ईबे (ebay) जो एक समय में ऑनलाइन सामान खरीदने और बेचने की सबसे बड़ी कंपनी थी उसका पसंदीदा (preffered) भुगतान भागीदार (payment partner) भी पेपाल (Paypal) ही था।

मुझे अपडेट नहीं है की विदेशों से पैसा मँगाने में आज भारत के लोग पेपाल (Paypal) का कितना इस्तेमाल करते है।  पर जब मैंने मैंने थोड़ा गूगल किया तो पाया कि आज इस काम के लिए और भी कई तरीके उपलब्ध हैं।

आइये आज पेपाल (Paypal) की भारत में स्तिथि देखते हैं। दुनिया कम्प्यूटर्स से मोबाइल की ओर जा रही थी।  भारत भी एक स्मार्टफोन उपभोक्ता के रूप में उभर रहा था। भारत में स्मार्टफोन लोगों का परिवार वालों से भी बड़ा मित्र बन चुका था। ईमेल का इस्तेमाल कम हो रहा था , मोबाइल का इस्तेमाल बढ़ रहा था। पेपाल (Paypal) का पैसे ट्रांसफर का तरीका ईमेल पर आधारित था। भारत में एक नए किस्म का पेमेंट सिस्टम एक प्राइवेट कंपनी पेटीम (paytm) द्वारा लांच किया गया  , जिसमें आप ईमेल की बजाय मोबाइल नंबर से पैसे ट्रांसफर कर सकते थे। यह इतना आसान तरीका था कि देखते ही देखते पेटीम ने (paytm) भारत के पेमेंट सिस्टम में शीर्ष स्थान प्राप्त कर लिया। लोग 10 रूपए के मोबाइल रिचार्ज के लिए भी पेटीम और फोनपे (phonepe) का इस्तेमाल करने लगे। और फिर यू पी आई (UPI) के आने से तो जैसे सोने पे सुहागा हो गया। बैंक से पैसे ट्रांसफर करने का दुनिया का सबसे सरल सिस्टम यू पी आई (UPI) के रूप में भारत में मौजूद गया।  पूरी दुनिया इसकी सफलता को आश्चर्य से देख रही थी।  गूगल (Google) जैसी कंपनी ने भी इसकी तारीफ की।  भारत की जीडीपी का एक हिस्सा अब यू पी आई (UPI) पर आधारित ट्रांसक्शन्स (transactions) पर आधारित हो गया । आज भारत में में पेटीम (paytm), फोनपे (phonepe), गूगल पे (google pay) और अमेज़ॉन पे (amazon pay) जैसी भारतीय और वैश्विक दिग्गज कंपनियां इस क्षेत्र में अग्रणी हैं , बस नदारद है तो दुनिया को एक समय में सबसे सरल पेमेंट सिस्टम देने वाला पेपाल (Paypal) । ऐसा नहीं है कि  पेपाल (Paypal) भारत में आना नहीं चाहता। पेपाल (Paypal) ने भी भारत में टीवी और वेब विज्ञापनों की मदद से अपनी पहचान बनाने की कोशिश शुरू कर दी है। देखते हैं क्या परिणाम होता है।


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वोडाफोन / आईडिया / एयरटेल  (Vodafone / Idea / Airtel)

मित्रो एक समय भारत की उपभोक्ता टेलिकॉम मार्किट पर एकछत्र राज करने वाली वोडाफोन आईडिया और एयरटेल के पैरों के नीचे से उस समय जमीन निकल गयी जब रिलायंस जियो की एंट्री हुई। एक नए प्लेयर ने पुरानी जमी हुई तीन कंपनियों का साम्राज्य हिला दिया।  इसके पीछे एक ही कारण था और वो था डाटा। रिलायंस जियो ने वक्त की नब्ज़ को समझा और नार्मल वौइस् (voice) प्लान के साथ भारत के डाटा हंगरी यूजर्स को एक जी बी (GB) डाटा हर रोज ऑफर किया।  यह ऑफर इतना बड़ा था की उस समय इसका कोई तोड़ नहीं था।  उस समय तक वोडाफोन आईडिया और एयरटेल अपने प्रचलित प्लानों में बहुत कम डाटा ऑफर कर रहे थे।  शायद उनके पॉपुलर प्लान एक जी बी (GB) डाटा के आस पास पूरे महीने दिया करते थे।  जिसके कारण लोग डाटा स्विच ऑफ करके रखा करते थे और जरूरत पड़ने पर ही ऑन (on) किया करते थे और दूसरों को भी ऐसी ही सलाह दिया करते थे क्योंकि कई ऍप बैक एन्ड में डाटा कंस्यूम करते रहते थे और एक  जी बी डाटा झट से ख़तम हो जाता था , लेकिन प्लान के अनुसार तो एक जी बी पूरे महीने चलना होता था। इसीलिए रिलायंस के एक जी बी डाटा प्लान ने तो जैसे क्रांति ही ला दी।  अब लोग व्हाट्स एप , यूट्यूब और गूगल मैप जैसे ऍप्स का खुलकर उपयोग करने लगे और जल्दी ही इन कंपनियों के यूजर्स रिलायंस की ओर जाने लगे। यह देख इन कंपनियों ने भी तुरत फुरत एक से दो जी बी डाटा रोज वाले प्लान लॉन्च किये , जिससे यही समझ में आया कि ये वो पहले भी कर सकते थे , बस इंतजार कर रहे थे की कोई उनके कम्फर्टेबले जोन में आकर उनको झकझोरे।  लेकिन तब तक काफी बिज़नेस लूज़ (loose) हो चुका था ,

बजाज स्कूटर्स (Bajaj Scooters)

एक समय था जब बजाज स्कूटर भारत में बुक कराने पड़ते थे , बुक करने के कई साल बाद डिलीवरी का नंबर आता था और यदि आपको डिलीवरी मिलने वाली होती थी तो आप अपनी बुकिंग को ब्लैक में हाथों हाथ बेच सकते थे। इसी कारण से कहा जाता था की बजाज स्कूटर को भारत में स्कूटर बेचने के लिए विज्ञापन देने की कोई जरुरत नहीं है। किन्तु एल एम एल वेस्पा के बाजार में आने के बाद यह स्तिथि बदल गई। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि एल एम एल के आने से बाजार स्कूटरों की डिलीवरी में थोड़ी तेजी आ गयी । एल एम एल ने स्कूटरों में इंडिकेटर दिया , जो पब्लिक ने हाथों हाथ लिया और सरकार को इतना अच्छा लगा कि सरकार ने स्कूटरों में  इंडिकेटर अनिवार्य कर दिया और इसके बाद बजाज को भी स्कूटरों में इंडिकेटर देना पड़ा। इस सबके बीच एल एम एल स्कूटर बाजार में अपनी एक छोटी सी जगह बना चुका था। एल एम एल द्वारा बजाज स्कूटरों को दिए गए कम्पीटिशन का असर यह हुआ कि 80 के दशक में ब्लैक में मिलने वाले स्कूटर्स धीरे धीरे ऑन डिमांड मिलने लगे और बजाज स्कूटर्स ने भी मुकाबला करने के लिए 'हमारा बजाज' नाम से विख्यात विज्ञापन टीवी पर देना शुरू कर दिया।

नई सदी में बजाज को लगा कि शायद आने वाला वक्त मोटरसाइकलों यानि कि बाइकों का है। परन्तु जिसको बजाज ने स्कूटरों का भारत में अंत माना था वह वास्तव में स्कूटरों में एक बहुत बड़े अध्याय की शुरुआत थी। बाजार में होंडा एक्टिवा (Honda Activa) का आगमन हुआ , जिसे हम स्कूटी कहते हैं दरअसल वह कुछ कम सी सी (cc वाला बिना गियर का स्कूटर ही है। सिर्फ गियर न होने से वह इतना लोकप्रिय हुआ (खास तौर से महिलाओं में) कि उनसे न केवल बजाज स्कूटर की अनुपस्तिथि में जो शून्यता उत्पन्न हुई थी उसको भरा , बल्कि मोटरसाकल की बिक्री को भी टक्कर दे दी।  जिस समय को बजाज ने केवल मोटरसाइकलों का माना , दरअसल उस समय पब्लिक एक ऐसे स्कूटर का इंतजार कर रही थी जिसे चलाना सबके लिए आसान हो। भारत में स्कूटर क्रांति हो रही थी, पर उस क्रांति में यदि कोई शामिल नहीं था तो हमारा प्यारा बजाज स्कूटर , जिसने वक्त के अनुरूप बाजार में बिना गियर का स्कूटर ना उतार कर पब्लिक को कुछ नया देने की बजाय स्कूटर बनाने ही बंद कर दिए।


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निरमा (Nirma)

एक समय में भारत में में वाशिंग पाउडर का पर्याय बन चुका निरमा भी अपने नंबर एक के स्थान को ज्यादा समय तक कायम न रख सका। निरमा उस समय के एक प्रचलित वाशिंग पाउडर सर्फ से काफी सस्ता था , झाग भी अच्छे बनाता था , और कपड़े भी अच्छे धुलते थे। इसलिए लोगों ने इसे हाथों हाथ लिया।  परन्तु इसकी एक बड़ी कमी थी।  इसके इस्तेमाल से हाथ जलते थे। काफी समय तक निरमा ने इस समस्या को हल करने का कोई विशेष प्रयत्न नहीं किया और जल्दी ही मार्किट में नया वाशिंग पाउडर 'व्हील' आ गया , जिसमें वो सारी विशेषताएं थीं जो निरमा में थीं पर वह इस्तेमाल से हाथों में जलन नहीं पैदा करता था।  व्हील निरमा को पछाड़ तो नहीं पाया पर उससे निरमा को कड़ी टक्कर जरूर मिली। व्हील के बाद मार्किट में कदम रखा एरिअल और टाइड ने , फिर सर्फ एक्सेल ने।  और सही मायने में इन तीनों ने निरमा से महंगे होते हुए भी , अपने अच्छे प्रोडक्ट और टीवी पर दनादन विज्ञापनों की मदद से निरमा के नाम को लोगों के दिमाग से कुछ हल्का कर दिया और निरमा की लोकप्रियता धीरे धीरे मार्किट में कम होने लगी। यहाँ इस कहानी से ऐसा लगता है कि खूब विज्ञापनों के दम पर किसी भी प्रोडक्ट को मार्किट में स्थापित किया जा सकता है तो  ऐसा बिल्कुल नहीं है। विज्ञापन को यदि गुणवत्ता का सहारा ना मिले तो प्रोडक्ट का मार्किट में लम्बे समय तक टिकना संभव नहीं है।  उदहारण के लिए मैं यहाँ घडी डिटर्जेंट का नाम लेना चाहूँगा , जिसकी पैकिंग शायद एरिअल टाइड और सर्फ एक्सेल जैसी नहीं है , कीमत भी कम है , और गुणवत्ता में भी कोई कमी नहीं है।  इसके विज्ञापन भी एरिअल टाइड और सर्फ एक्सेल के मुकाबले कम आते हैं फिर भी अपनी गुणवत्ता के कारण यह बहुत लोकप्रिय है और मुझे डाटा तो नहीं पता पर शायद घडी डिटर्जेंट भारत का नंबर वन हो।

राजपूत और अन्य भारतीय राजा (Rajpoot)

अगर आपने पुरानी कहानियां पढ़ीं हो तो आप जानने लगेंगे की भारत के राजपूत और अन्य भारतीय राजा अपनी आन बान शान के लिए युद्ध किया करते थे। वो युद्ध में भी जीवन मूल्यों को कभी नहीं छोड़ते थे , जैसे हारे हुए राजा को जीवित छोड़ देना , शरण में आये का वध नहीं करना , निशस्त्र पर शस्त्र ना उठाना , पींठ पर वार ना करना , युद्ध की मार काट से जनता को दूर रखना, पूजा स्थलों पर आक्रमण ना करना, स्त्रियों और बच्चों पर शस्त्र न उठाना इत्यादि। भारतीय राजाओं को लगता था की शायद ऐसे ही युद्ध होते हैं , परन्तु वे बदलते समय को नहीं समझ पाए और जब भारत में विदेशी आक्रमण होने लगे तो भारतीय राजाओं का सामना ऐसे आक्रमणकारियों से होने लगा जिनके जीवन मूल्य कुछ और ही थे। विदेशी आक्रमणकारी युद्ध को आन , बान , शान के लिए नहीं, केवल जीतने के लिए लड़ते थे। हारे हुए राजा का वध कर देना, धोखे से आक्रमण करना, युद्ध जीतने के बाद जनता में मारकाट करना, स्त्रियों का बलात्कार , धार्मिक स्थानों में तोड़ फोड़ उनके युद्ध अस्त्र थे।  विदेशी आक्रमणकारियो के लिए युद्ध में भावनाओं का कोई स्थान न था। इस तरह के जीवन मूल्यों से भारत के राजा परिचित न थे और नतीजा यह हुआ कि , भारत के बाहर हो रहे परिवर्तनों को न समय पर ना समझ पाने के कारण भारतीय राजा अपनी युद्ध नीतियों में जरूरी सुरक्षात्माक परिवर्तन नहीं कर पाए और आक्रमणकारियों को रोकने में विफल रहे।


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मुग़ल (Mughal)

मुग़ल वैसे तो विदेशी आक्रमणकारी ही थे , परन्तु वे दूसरे आक्रमणकारियों से कुछ अलग थे। जहाँ मुग़लों से पहले आये आक्रमणकारी भारत को लूट कर चले गए, वही मुग़ल भारत में ही बस गए।  भारत में उनकी छह सात पीढ़ियों ने राज किया और एक समय लगभग तीन चौथाई से भी ज्यादा भारत पर उनका राज था।  इसमें कोई शक नहीं की मुग़ल कुशल प्रशासक थे  परन्तु बदलते वक्त के साथ न वो अपने आप को और न ही भारत को बदल सके। यूरोप में जहाँ एक और औद्योगिक क्रांति हो रही थी , वहीं मुग़लों के नेतृत्व में भारत इससे एकदम अछूता था।  मुग़ल जहां अपने शासन की लड़ाइयों , भोग विलासिता और बड़ी बड़ी इमारतें बनवाने में व्यस्त थे, उसी समय दुनिया साइंस और टेक्नोलॉजी में भारत से काफी आगे निकल गयी।  और अपने आप को समय के साथ परिवर्तित न करने का नतीजा यह हुआ कि मुग़लों से तकनीक में उन्नत हथियारों वाली यूरोपीय ताकतें जब भारत को लूटने आयीं तो मुग़ल अपना साम्राज्य और भारत दोनों को बचाने में नाकाम रहे।

समाप्त।


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जब पश्चिमी विज्ञान ने अपने आप को ही गलत साबित किया (When western science proved itself wrong)

When western science proved itself wrong

वैसे तो हम लोग हमेशा ही भारतीय सभ्यता और संस्कृति को छोड़ कर पश्चिमी सभ्यता की ओर अधिक आकर्षित होते रहे हैं, पर आज मैं आपको इस ब्लॉग पोस्ट के जरिये, कुछ उदाहरण देकर यह बताना चाहता हूँ कि कब कब पश्चिमी विज्ञान ने अपने आप को ही गलत साबित किया है। ऐसा होने के कई कारण हो सकते हैं , फिर चाहें वो अनभिज्ञता हो या व्यापारिक कारण या अधूरा ज्ञान भी हो सकता है, पर ऐसा हुआ है । इसके साथ साथ एक और बात भी सच है की जब जब बात चयन की आयी है हमने हमेशा पश्चिमी चीजों को ही अधिक महत्व दिया है , इसका एक साधारण लेकिन ज्वलंत उदहारण यह है कि एक अच्छी खासी विकसित हिंदी भाषा के होते हुए भी हम में से ज्यादातर लोग अंग्रेजी को हिंदी से ज्यादा महत्त्व देते हैं।

आइये मैं आपको कुछ उदहारणों के माध्यम से बताता हूँ, जो मैंने अपनी जिंदगी में अनुभव किए हैं , कि कैसे पश्चिमी विज्ञान ने कई बार अपने आप को ही गलत साबित किया है।

टॉन्सिल्स (Tonsils) का इलाज

यदि आपकी उम्र 40 वर्ष से अधिक है और अगर आप 40 वर्ष पीछे फ्लैशबैक में जाएं तो आपको याद आएगा कि किसी साधारण बातचीत में कोई न कोई ऐसा निकल आता था जिसका खुद का या उसके किसी जानने वाले का टॉन्सिल का ऑपरेशन हुआ होता था। सबकी कहानी एक सी ही होती थी। टॉन्सिल फूल जाते थे और टॉन्सिल हमारे शरीर में अवांछनीय अंग है ऐसा कहकर डॉक्टर ने ऑपरेट कर के निकाल दिया होता था। आज 40 साल बाद आपको एक भी ऐसी कहानी सुनने के लिए नहीं मिलेगी बल्कि आज यदि आप किसी से कहेंगे कि टॉन्सिल हमारे शरीर का एक अवांछनीय अंग है तो वो आपको पागल समझेगा और उल्टा आपको बातएगा की टॉन्सिल हमारी प्रतिरोधात्मक क्षमता यानि की इम्युनिटी का जरूरी भाग है।  यहाँ समस्या यह नहीं है कि विज्ञान ने नई नई खोज करे अपने को सुधारा बल्कि समस्या यह है कि विज्ञान ने अपनी गलती मानी ही नहीं और चुपचाप से हमारी किताबों में पिछली जानकारी मिटाकर नई जानकारी कि, टॉन्सिल हमारी प्रतिरोधात्मक क्षमता यानि की इम्युनिटी का जरूरी भाग है डाल दी गयी। अब इस बात को एक पीढ़ी से अधिक बीत चुकी है और नई पीढ़ी यह जानती भी नहीं कि इस विषय में कभी न  केवल विज्ञान गलत था बल्कि उसकी दिशा भी गलत थी। अब यह गलती थी या उस समय टॉन्सिल का ऑपरेशन और उसके बार इस्तेमाल होने वाली दवाइयों को बेचने की साजिश , कौन जानता है।

अपेंडिक्स (Appendix) का इलाज

जो हाल आज से 40 साल पहले टॉन्सिल्स का था , वही हाल आज से २५-30 साल पहले अपेंडिक्स का था।  अचानक खबर मिलती थी कि फलां को कल पेट में बहुत दर्द हुआ, उसको अस्पताल ले गए थे , जहाँ डॉक्टर  ने उसका अपेंडिक्स का ऑपरेशन करके उसका अपेंडिक्स निकाल दिया। सुनने वाला तुरंत अपना ज्ञान बांटता था , कि अपेंडिक्स तो हमारे शरीर में एक बेकार अंग (vestigial organ) है जो मानव विकास के क्रम में छूट गया। यानि कि जैसे पूँछ गायब हो गई , अपेंडिक्स गायब नहीं हुई। ये सब उस समय हमारी स्कूल की किताबों का हिस्सा था और हमें पढ़ाया जाता था। आज तीस साल बाद शायद ही कोई अपेंडिक्स का ऑपरेशन सुनाई देता हो। आज अपेंडिक्स को हमारी प्रतिरोधात्मक क्षमता यानि की इम्युनिटी का जरूरी भाग माना जाता है। ऐसा इसलिए क्योंकि ये हमारी आज की स्कूल की किताबों में लिखा हुआ है।  बस नहीं लिखा तो ये की विज्ञान पहले इस विषय में गलत था और इसमें सुधार किया गया है। यदि वैकल्पिक चिकित्सा पद्यति जैसे कि आयुर्वेद और होम्योपैथी में कोई गलती मिल गयी होती हो दुनिया भर के पश्चिमी और भारतीय मैगज़ीन और अख़बार चीख चीख कर सालों तक सबको बताते, उदहारण के लिए जैसे कि एलॉपथी के सभी लेखों में आयुर्वेद में भारी धातुओं के प्रयोग को सेहत के लिए बहुत खतरनाक बताया जाता है। आयुर्वेद ने तो 5000 सालों में किसी का कुछ नुकसान किया नहीं पर कल यदि पश्चिमी ज्ञान को पता चल गया कि भारी धातुएँ सेहत के लिए अच्छी होती हैं तो वो अवश्य ही चुपचाप से संसार भर में अपने पुराने प्रकाशित लेखों को गायब कर देंगे और नया ज्ञान अपनी नई खोज के तौर पर हमारी साइंस की किताबों में लिख देंगे।


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गाल ब्लैडर (Gall Bladder) का इलाज

अब चलते हैं आज के लेटेस्ट ट्रेंड की तरफ यानि की गाल ब्लैडर का इलाज।  तो मित्रों जो ट्रेंड आज  से 40 साल पहले टॉन्सिल्स का था और 25 साल पहले अपेंडिक्स का था , आज वही ट्रेंड गाल ब्लैडर के इलाज का है। बस पेट का दर्द होने दीजिये , डाक्टर के पास जाइये और ज्यादा चांस यही निकलेगा की आपके गाल ब्लैडर में पथरी है और इसको निकालना पड़ेगा।  आज गाल ब्लैडर ऑपरेशन करके निकालने की दर इतनी तेज है की यदि आप चार लोगो से बात करेंगे तो सभी चारों की रिश्तेदारी या जान पहचान में ऐसे एक दो मामले जरूर होंगे जिनका गाल ब्लैडर निकाला जा चुका होगा। पता नहीं कैसे पिछले कुछ दशकों में हमारे टॉन्सिल्स और अपेंडिक्स तो मजबूत हो गए हैं पर शायद गाल ब्लैडर कमजोर हो गए हैं , या फिर ये पैसे कमाने का नया तरीका है। इसका उत्तर तो २० साल बाद का समय ही बताएगा कि उस समय भी गाल ब्लैडर ही निकाले जा रहे होंगे या कुछ और ? पर आज तो गाल ब्लैडर निकालना एक बड़ी इंडस्ट्री बन गया है। सारे भारत का तो मुझे पता नहीं पर दिल्ली एनसीआर में ऐसे एक हॉस्पिटल के चेन मुझे मालूम है जो केवल गाल ब्लैडर का ही इलाज और ऑपरेशन करते हैं और उनका बिज़नेस अच्छा चल रहा है।

चारकोल वाला टूथपेस्ट (Charcoal Toothpaste)

मैं यहां कंपनी का नाम तो नहीं बताऊंगा पर जहां तक मेरी यादाश्त है , जब 'हम लोग' और 'ये जो है जिंदगी' जैसे सीरियल आते थे तब एक टूथ पाउडर का विज्ञापन आता था , एक सफ़ेद सतह पर कोयले का चूरा (पाउडर) और उस कंपनी के टूथ पाउडर पड़े होते थे , जिनको एक डॉक्टर जैसा सफ़ेद कोट पहना आदमी कपड़े से पोंछ देता था। जहाँ एक और सफ़ेद टूथ पाउडर कोई निशान नहीं छोड़ता था वहीँ कोयले का पाउडर काला धब्बा छोड़ जाता था। इसमें यह दिखाने का प्रयत्न किया गया था की भारतीय लोग जो , कोयले , कोयले की राख और ईंट के चूरे इत्यादि से उस समय दांत माँझ लिया करते थे , वे सब दांतो को नुकसान पहुंचाते थे और आप टूथ पाउडर से दांत साफ़ करेंगे तो ही दांतों के लिए ठीक है। आज लगभग ४० साल बाद चारकोल (कोयले का परिष्कृत रूप) वाला टूथ पेस्ट बिकता है। एक समय हमारे कोयले से दांत मांझने को गलत कहा गया और आज हमें दाँत मांझने के लिए कोयला बेचा जा रहा है और लोग धड़ल्ले से खरीद रहे हैं। मैंने उस विज्ञापन को यूट्यूब पर खोजने की  बहुत कोशिश की परन्तु मुझे मिला नहीं , वर्ना मैं वो विज्ञापन यहाँ अवश्य प्रकाशित करता।


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वनस्पति घी (Vanaspati Ghee)

पचास , साठ और सत्तर के दशक में भारत से वनस्पति घी का गहन परिचय कराया गया। 'डालडा' शब्द तो जैसे इसका पर्याय ही बन गया था। अब चूंकि घी (देसी) केवल दक्षिण एशिया में ही इस्तेमाल होता है तो यह उत्पाद (प्रोडक्ट) केवल हमारे देश को ध्यान में रखकर ही बनाया गया था। इसकी खराबी और अच्छाई कुछ भी प्रकाशित नहीं करी गयी , बस खुशबू को छोड़कर , बाकी सब कुछ यानि की रंग रूप बिलकुल देसी घी जैसा रखा गया और कीमत देसी घी की कीमत से चौथाई। यूँ समझिये की भारत की गरीब जनता को तोहफा दिया गया था। कम कीमत और देसी घी जैसा रंग रूप होने की वजह से इसने बहुत जल्दी भारतीय रसोइयों में अपना स्थान बना लिया। नतीजा था , अस्सी का दशक आते आते भारत में हार्ट अटैक मामले अचानक तेजी से सामने आने लगे। हर मौत के पीछे ज्यादातर कारण हार्ट अटैक ही होता।  आगे की कहानी नीचे रिफाइंड आयल के साथ जारी है।

रिफाइंड तेल (Refined Oil)

वनस्पति घी से बढ़ते हुए हार्ट अटैक के मामलों को संभालने के लिए पश्चिमी विज्ञान फिर एक बार संकट मोचन की तरह सामने आया और अस्सी / नब्बे  के दशक में भारत को रिफाइंड आयल का तोहफा दे दिया गया। भारत वापिस देसी घी की ओर न चला जाये इसके लिए यह तोहफा जरूरी था और सबको यह ज्ञान भी देना जरूरी था का भारत को दिए गए इस नायब तोहफे की खासियत क्या है। तो यह अमूल्य ज्ञान हमारी विज्ञान की किताबों में भी डाल दिया गया। हमें सिखाया जाने लगा कि वनस्पति घी ख़राब होता है क्योंकि वो हाइड्रोजनेटेड होता है , जबकि रिफाइंड आयल हाइड्रोजनेटेड नहीं होता। इसी कारण से वनस्पति घी कमरे के तापमान (room temperature) पर जम जाता है और रिफाइंड आयल नहीं जमता।  जो वनस्पति घी कमरे के तापमान पर जम जाता है वो हमारी धमनियों में भी जम जाता है , इसीलिए हार्ट अटैक होता है। और वनस्पति घी सैचुरेटेड फैट्स होता है जो कि हार्ट के लिए बहुत खतरनाक होता है और रिफाइंड आयल नॉन सैचुरेटेड फैट्स होता है जो हार्ट के लिए अच्छा है। जब हमें ये क्लास में पढ़ाया जा रहा था तो मैंने मैडम से पूछा था की मैडम , सरसों का तेल भी नहीं जमता तो क्या वो नॉन सैचुरेटेड फैट्स के उदाहरण में एग्जाम में लिख सकते हैं तो मैडम को खुद नहीं पता था की सरसों का तेल नॉन सैचुरेटेड फैट्स है कि नहीं।  खैर रिफाइंड आयल खाने से हार्ट अटैक का तो पता नहीं कम हुए कि नहीं पर , नब्बे के दशक से डायबिटीज के केस भारत में बेतहाशा बढ़ने लगे जो आज तक कायम हैं क्योंकि रिफाइंड आयल भी आज तक कायम है।


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ओलिव आयल (Olive Oil)

अब पिछले पच्चीस सालों में रिफाइंड आयल से काफी कमाई होने के बाद , कुछ नया चाहिये था , इसलिए अब पश्चिमी और  से ओलिव आयल आ गया। अचानक बहुत सारी स्टडीज आने लगीं , जिसमें ओलिव आयल की खूबियों के कसीदे गढ़े जाने लगे। संयोग यह रखा गया की 1991 में अर्थ व्यवस्था में क्रांति की वजह से जब नई सदी भारतीयों के पास पैसा बढ़ने लगा तो यह बिलकुल सही समय था ओलिव आयल जैसे 10 गुना महंगे प्रोडक्ट को भारत में घुसाने का। एक तरफ जहाँ ओलिव आयल को अच्छा बताने वाली स्टडीज की भरमार थी तो दूसरी तरफ , हार्ट के लिए डॉक्टर इसे धड़ल्ले से रेकमेंड (सिफारिश) करने लगे। शुरू शुरू में में यह १० से १५ गुना महंगा था जो अभी भी सरसों के तेल से पांच छह गुना महंगा है। मजे की बात यह है कि यह ऐसे पौधे से निकलता है जो भारत में नहीं होता तो उन्होंने यह सुनिश्चित कर लिया की भारत इसका तोड़ जल्दी ना ढूंढ पाए। कुछ भी हो पश्चिम का यह प्रोडक्ट भारत में बहुत फल फूल रहा है। लेकिन ओलिव आयल को दुनिया में एक दूसरी ही चुनौती का सामना करना पड़ा। ओलिव आयल के साथ साथ दुनिया में इंटरनेट भी आ गया।  कुछ पश्चिम के और कुछ भारत के खुराफाती लोगों ने जल्द ही दुनिया को यह बता दिया कि भारत का सरसों का तेल वह सब खूबियां रखता है जो ओलिव आयल में बताई जाती हैं। जल्दी ही पश्चिमी दुकानों में सरसों का तेल उपलब्ध होने लगा। ऐसा होते देखकर ओलिव आयल लॉबी को धक्का लगा और एकदम से पश्चिमी शोधकर्ताओं ने बहुत सारी प्रायोजित (sponsored) स्टडीज कर डाली और डॉक्यूमेंट्री चैनल्स और मैगज़ीनों में ऐसी स्टडीज की बाढ़ आ गयी जिसमें यह निष्कर्ष निकाला गया की ओलिव आयल और सरसों के तेल में कोई समानता नहीं है और ओलिव आयल वाले फायदे सरसों का तेल नहीं दे सकता। मैंने खुद बहुत साल पहले ऐसी एक स्टडी पढ़ी थी जिसमें 500 लोगों से सैंपल साइज़ पर यह निष्कर्ष निकाल दिया गया था की सरसों का तेल हृदय के लिए ख़राब है। एक डॉक्यूमेंट्री चैनल पर तो मैंने ऐसी स्टडी  भी देखी जिसमे शायद 30 लोगों पर स्टडीज करके सरसों के तेल को ओलिव आयल के सामने बेकार सिद्ध कर दिया गया था। हे भगवान अब 5000 सालो हे हजारों पीढ़ियों में अरबों लोगों द्वारा इस्तेमाल किया गया सरसों का तेल ३० लोगों या 500 लोगों की स्टडीज में फेल होने लगा। अब पता नहीं पश्चिम को कितने साल लगेंगे हमें यह बताने के लिए कि ओलिव आयल भी इतना अच्छा नहीं है और इससे भी बेहतर प्रोडक्ट वो ले आये है। और हमें ये भी नहीं पता कि जैसे वनस्पति घी ने हार्ट अटैक के मामले बढ़ाये , रिफाइंड आयल ने डायबिटीज बधाई , अब ये ओलिव आयल क्या बढ़ाएगा।

ओट्स (Oats)

ओट्स की कहानी भी कुछ कुछ ओलिव आयल जैसी ही है। इसे भी भारत में तभी लांच किया गया जब भारत की उपभोक्ता शक्ति बढ़ी और भारत एक बड़े उपभोक्ता बाजार के रूप में उभरा। इसमें भी जो फसल इस्तेमाल होती है वो भारत में नहीं उगाई जाती।  तो यहाँ भी यह ध्यान रखा गया की भारत में आसानी से इसका विकल्प उयलब्ध न हो सके।  इसे कोलेस्ट्रॉल कंट्रोल कम करने वाला बताया गया और ओलिव आयल की तरह ही डॉक्टर इसको रिकमेंड करने लगे। लेकिन इंटरनेट पर खुराफाती लोगों ने जल्दी ही बता दिया कि भारत में ज्वार इसका बेहतर विकल्प है। परन्तु यहाँ ओट्स और ज्वार में वैसी टक्कर नहीं है जैसी की सरसों के तेल और ओलिव आयल में है क्योंकि जहाँ सरसों के तेल का भारत में अभी भी बहुत ज्यादा प्रचलन में है वहीं ज्वार ,ओट्स के आने से पहले ही प्रचलन से बाहर हो चुकी थी।  तो कोई मुकाबला ना होने की वजह से ओट्स बाजार में 400 रूपए किलो के हिसाब से धड़ल्ले से उपजब्ध है और इसका उपभोग भी हो रहा है। अब भगवान ही जाने कब पश्चिमी विज्ञान हमें बताएगा कि ओट्स सेहत के लिए इतना भी अच्छा नहीं है ओर वो हमारी सेहत का ख्याल रखते हुए हमारे लिए कोई नया प्रोडक्ट ले आये हैं।

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क्या वास्तव में सिकंदर ने पोरस को हराया था ? (Did really Alexander defeated Porus?)

Did really Alexander defeated Porus


क्या वास्तव में सिकंदर ने पोरस को हराया था ? (Did really Alexander defeated Porus)

आइये आज कुछ इतिहास के पन्ने पलटते हैं।  चलते हैं आज से लगभग २४०० वर्ष पूर्व , जब एक आक्रांता सिकंदर भारत के दरवाजे पर खड़ा था। वो उसके हिसाब से पूरी दुनिया को जीतता हुआ आया था और भारत उसकी जीत का आखिरी मील का पत्थर साबित होने वाला था।  परन्तु भारत के एक बहुत ही छोटे से राज्य पौरव राष्ट्र , जिसको शायद उस समय और आज भी भारत के नक़्शे पर ढूढ़ना मुश्किल है, उसके राजा महान पौरस ने बैरंग डाक की तरह हरा कर भेजा था।

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अब आप में से 80 - 90 प्रतिशत लोग मेरी बात से सहमत नहीं होंगे और वो कहेंगे कि यह तो गलत है , असलियत में तो सिकंदर महान ने पौरस को हराया था।  इसमें उनका कोई दोष नहीं है , क्योंकि हमें बचपन से हमारी ही किताबों में पढ़ाया गया है और फिल्मों और सीरियल में दिखाया गया है की महान सिकंदर ने पौरस को हराया था। और फिर हमारा इतिहास तो अंग्रेजों ने लिखा है। हमने तो कभी अपने इतिहास को लिखने या परिभाषित करने की कभी कोशिश नहीं की। हमें क्या फर्क पड़ता है अगर अंग्रेजों ने पौरस को इतिहास में हरा दिया। हम तो वसुधैव कुटुंबकम वाले लोग हैं। पूरी दुनिया ही हमारा परिवार है। तो अंग्रेज भी हमारे परिवार के हैं और सिकंदर भी। जी हाँ , जो समाज 70 साल में भी अंग्रेजी का बोझ नहीं उतार पाया उसको क्या फर्क पड़ता है।  जो समाज अपनी संस्कृति छोड़कर पाश्चात्य संस्कृति को ग्रहण करना आधुनिकता मानता है उसे क्या फर्क पड़ता है। जहाँ के लोग कालिदास से ज्यादा शेक्सपीयर के बारे में जानते हैं उनको क्या फर्क पड़ता है। जहाँ के लोग कालिदास को शायद अकबर का नवरत्न बताएं , उनको क्या फर्क पड़ता है। जहां , तक्षशिला कहाँ था , इसका उत्तर बिहार मिले , क्योंकि लोगों को तक्षशिला और नालंदा में अंतर नहीं पता , उनको क्या फर्क पड़ता है। किसी ने ठीक ही कहा है :

जिसको न निज गौरवतथा निज देश का अभिमान है।
वह नर नहीं , नर पशु निरा है और मृतक के समान है।

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बचपन में बड़ा ही लोमहर्षक लगता था , यह सुनकर कि पौरस को हराने के बाद जब बंदी बनाकर लाया गया तो सिकंदर ने उससे पूछा कि बोल तेरे साथ क्या सलूक किया जाए , मार दिया जाए कि छोड़ दिया जाये , और पौरस ने बड़ी ही बहादुरी के कहा कि , वही सलूक किया जाए जो एक राजा को दूसरे राजा के साथ करना चाहिए। सच में रोंगटे खड़े हो जाते थे ये कहानी सुनकर और पढ़कर। इस कहानी में सिकंदर को एक महान राजा बताया गया है और पौरस को साधारण।  तब ये एक कहानी थी , पर जब इस कहानी को तर्कों की कसौटी पर कसा तो इसमें कई खामियां निकली। साक्ष्य तो हमारे पास नहीं हैं और निश्चित ही इतिहासकारों के पास भी बहुत ज्यादा नहीं रहे होंगे , पर तर्कों के आधार पर इस ब्लॉग पोस्ट में हमने यह बताने का प्रयत्न किया है कि कैसे हमारे इतिहास को तरोड़ मरोड़ कर लिखा गया है और हमारी शिक्षा के माध्यम से हमारे दिमाग में फिट किया गया है। जिनको मेरे तर्क समझ में आ जाएं , उनको धन्यवाद , और जिनको अच्छे न लगें तो क्या फर्क पड़ता है।

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आइये क्रमबद्ध तरीके से एक एक पहलू का विश्लेषण करते हैं। सबसे पहले तो आपको बता दें कि एलेग्जेंडर को फारस में सिकंदर कहा जाता था और क्योंकि भारत और फारस के व्यापारिक रिश्ते बहुत मजबूत थे तो फारस का शब्द सिकंदर भारत में भी प्रचलित हो गया।

पहले कुछ ऐसे तथ्य जो इतिहासकारों ने हमें बताये :

1.  इतिहासकार लिखते हैं कि पौरस से युद्ध में सिकंदर को काफी हानि हुई थी, उसकी सेना के हौसले पस्त हो गए थे, उसके सैनिक थक चुके थे और घर वापस लौटना चाहते थे। पौरस से युद्ध में सिकंदर की काफी हानि हुई थी , यह बात तो ठीक है पर जीतने के बाद उसकी सेना के हौसले पस्त हो गए थे यह बात हजम नहीं होती क्योंकि जीत कैसे भी मिले हमेशा हौसले बढाती है। हौसले पस्त तो तभी हो सकते हैं जब सिकंदर की हार हुई हो पौरस के हाथों। सिकंदर के सैनिक थक गए थे और वो वापस घर लौटना चाहते थे , यह बात तब हजम नहीं होती जब सिकंदर की जीत हुई हो क्योंकि यदि जीत सिकंदर की हुई होती तो पौरव राष्ट्र और तक्षशिला , दो राज्य उसके आधीन थे और इन राज्यों में सिकंदर के सैनिकों की थकान मिटाने के पर्याप्त साधन थे। मुझे लगता है उनकी थकान और निराशा उनकी हार के कारण थी वार्ना दस साल ने घर से दूर रह चुके सैनिकों को अचानक घर याद आ गया और वो भी तब जब एक ओर राज्य मगध को हराते ही उनका विश्व विजय का ख्वाब पूरा होने वाला था क्योंकि भारत ही उनकी आखिरी मंजिल थी।

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2. इतिहासकार यह बताते है कि सिकंदर की सेना पौरस की सेना में हाथियों को देखकर डर गयी थी और मगध की सेना में हजारों हाथी थे इसलिए सिकंदर की सेना ने आगे बढ़ने से मना कर दिया। अब यह बात तो बिल्कुल हजम नहीं होती क्योंकि वही इतिहासकार यह भी बताते हैं कि सिकंदर की सेना ने हाथियों की आँखों को भालों से फोड़कर , उनको अँधा करकर पौरस की सेना के हाथियों को एक ऐसे शस्त्र के रूप में बदल दिया था जो अँधा होने के बाद दोनों ही सेनाओं के लिए खतरनाक थे। तो फिर अचानक उस महान सिकंदर को मगध के हाथियों से क्यों डर लग गया ?

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3. इतिहासकार यह बताते है कि सिकंदर पौरस की बहादुरी देखकर बहुत प्रभावित हुआ इसलिए उसने पौरस को जीवित छोड़ दिया और उसका राज्य भी लौटा दिया। जिस सिकंदर ने मेसिडोनिआ की सत्ता हासिल करने के लिए अपने पिता फिलिप और अपने भाई को मार दिया , जिस सिकंदर ने मात्र बहस होने पर अपने वफादार मित्र सिलिटस को मार दिया। जिस सिकंदर ने हर उस राजा को या तो युद्ध में मार दिया या हारने के बाद बंदी बनाकर मार दिया , जिसने भी उससे युद्ध किता , उस सिकंदर को अचानक पौरस में इतनी बहादुरी दिखाई की उसने न केवल पौरस को जीवित छोड़ दिया बल्कि उसके साथ साथ उसने आगे बढ़ने का ख्वाब भी छोड़ दिया। चलो एक मिनट के लिए मान भी लेते हैं की सिकंदर को पौरस की बहादुरी देखकर उस पर दया आ गयी और उसने पौरस को छोड़ भी दिया , तब भी यह बात समझ में नहीं आती की उसने मगध पर आक्रमण क्यों नहीं किया जबकि अब तो तक्षशिला के साथ साथ पौरव राष्ट्र भी उसके साथ था।

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आइये कुछ नए पहलुओं पर भी ध्यान देते हैं जो अंग्रेजी इतिहासकारों ने शायद जानबूझकर छोड़ दिए :

1. युद्ध के बाद दोनों राजा जीवित थे : यह बहुत महत्वपूर्ण बात है। युद्ध के बाद दोनों राजाओं का जीवित होना एक ही स्तिथि में संभव है की जीत भारतीय राजा की हुई हो। क्योंकि सिर्फ भारतीय राजाओं को ही हारे हुए जीवित प्रतिद्वंदी को छोड़ने , उसका राज्य वापस लौटाने या उसको सुरक्षित वापस लौटने देने की बीमारी थी। यह केवल भारत की संस्कृति की विशेषता है। भारत के अतिरिक्त विश्व में कहीं भी ऐसे उदहारण नहीं मिलेंगे। पृथ्वीराज चौहान द्वारा कई बार मोहम्मद गौरी को जीवित छोड़ने और वापस जाने देने का उदहारण शायद सबको मालूम है। यह कारनामा पृथ्वीराज चौहान को कितना भारी पड़ेगा उसको नहीं मालूम था उसी प्रकार पौरस को भी नहीं मालूम था की उसकी सिकंदर को जीवित वापस जाने देने की बीमारी को अंग्रेज इतिहासकार नहीं समझ पाएंगे और उसको उल्टा पौरस की हार के रूप में दिखाएंगे , जिसको उसके अपने देश वाले भी मान लेंगे।

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2. सिकंदर जिस रास्ते से आया था उससे वापस नहीं गया : यदि आप थोड़ा सा भी गूगल करेंगे तो पाएंगे की जहाँ सिकंदर का आना हिन्दुकुश से हुआ और जाना ईरान के शहर जेड्रोसिया की ओर से जो की भारत के राजस्थान  और गुजरात के बाहरी ओर से और समुन्द्र के साथ से होते हुए जाता था। निश्चित रूप से सिकंदर के लिए एक नया और मुश्किल रास्ता था। अब सोचने की बात यह है कि कोई राजा अपनी थकी हुई सेना जो जल्दी से जल्दी घर पहुंचना चाहती है उसे नए , मुश्किल और लंबे रास्ते से क्यों ले जायेगा जबकि उसके पीछे पूरा उसका जीता हुआ इलाका पड़ा था जहाँ से वो अपनी सेना को आराम से सुख सुविधा पूर्वक वापस ले जा सकता था। ऐसा तभी हो सकता है जब जीतने वाले राजा पौरस ने उसे नए रास्ते से वापस जाने के लिए मजबूर किया हो क्योंकि पौरस जानता था की यदि सिकंदर उस रास्ते से वापस जायेगा जिसे वो जीतता हुआ आया है तो वो अवश्य ही अपनी शक्ति एकत्रित करके दुबारा आक्रमण कर सकता है इसलिए उसने सिकंदर को अपनी सेना सहित वापिस जाने के लिए हिन्दुकुश से वापस जाने की अनुमति नहीं दी।

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3. सिकंदर मच्छर के काटने से मलेरिया होने से नहीं बल्कि पौरस द्वारा युद्ध में दिए गए घावों से मरा था : अब यदि आप मेरे ऊपर दिए तर्कों से सहमत हैं तो इस बात से भी सहमत हो जायेंगे कि सिकंदर मच्छर के काटने से मलेरिया होने से नहीं बल्कि पौरस द्वारा युद्ध में दिए गए घावों से मरा था क्योंकि मुझे नहीं लगता कि मलेरिया दुनिया में सिकंदर को ही सबसे पहले हुआ होगा और यूनान जैसी सभ्यता जो विश्व विजय की कामना रखती होगी उसके वैद्यों को उस समय के अनुसार मलेरिया का प्रचलित इलाज ना मालूम हो। मच्छर से सिकंदर की मौत दिखाना कुछ ऐसा लगता है जैसे इतिहासकारों ने पौरस के हाथों सिकंदर को मिली शर्मनाक हार पर पर्दा डाला हो।

खैर जिसे मानना है वो माने और जिसे नहीं मानना है वो ना माने , पर हम तो सिकंदर की बजाए पौरस को महान  कहना अधिक सही मानेंगे।

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भारत के बारे में 10 अच्छी बातें (10 Good Things About India)

वैसे तो यदि भारत की अच्छी बातों की एक बहुत लम्बी सूची तैयार की जा सकती है , पर मैंने मेरे अनुसार , जो मुझे भारत के बारे में सबसे अच्छी और विशेष 10 बातें लगीं , उनका संकलन इस ब्लॉग पोस्ट में आपके लिए प्रस्तुत किया है। यदि आपको लगता है कि कुछ वर्णनीय मैंने छोड़ दिया है तो , आप से अनुरोध है , मुझे कमेंट में लिख कर जरूर बताएं और आपको मेरा यह संकलन कैसा लगा यह भी अवश्य बताएं।

जिसको न निज गौरव तथा निज देश का अभिमान है ,
वह नर नहीं नर पशु निरा है , और मृतक के समान है।

1. भारत ने कभी किसी देश पर आक्रमण नहीं किया (India never attacked any country)

जी हाँ मित्रों , कितनी सरल ही बात है , आपकी पता भी थी पर आपने अपने देश की इस विशेषता की ओर कभी ध्यान नहीं दिया। भारत की यह विशेषता इसलिए बही क्योंकि भारत को कभी इसकी आवश्यकता ही नहीं पड़ी।  इतिहास में एक सभ्यता ने दूसरी सभ्यता के ऊपर अधिकतर आक्रमण या तो लूटपाट के उद्देश्यों से या जमीन हड़पने के उद्देश्यों से किये गए हैं। भारत को दोनों की ही जरुरत नहीं थी। भारत के पास तो इतना धन था की भारत तो खुद तो सोने की चिड़िया कहलाता था और जमीन के लिहाज से तो आज का राजनितिक भारत अभी भी दुनिया का सातवां बड़ा देश है , और यदि इसमें से अलग हुए देश इसमें जोड़ दिए जाएं तो यह और बड़ा हो जायेगा।  तो मित्रों भारत को किसी पर आक्रमण की आवश्यकता ही नहीं थी , बल्कि भारत के ऊपर जितने लुटेरों के आक्रमण हुए है , शायद ही दुनिया के किसी देश पर हुए हों। अब कुछ लोग कहेंगे क्या राम जी ने लंका पर आक्रमण नहीं किया था , क्या 1971 ने भारत ने पूर्वी पाकिस्तान पर आक्रमण नहीं किया था तो मेरे भाई , भारत से मेरा मतलब है भारतीय उपमहाद्वीप के लोगों ने कभी भारतीय उपमहाद्वीप के बहार आक्रमण या अतिक्रमण नहीं किया। अब तो ठीक है ना।

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2. भारत ने विश्व विजेता सिकंदर को हराया था (India defeated the Alexander)

वैसे तो सिकंदर विश्व विजेता था ही नहीं।  यूनान से चलकर भारत की सीमा तक आ जाने को विश्व नहीं कहते। पर यदि एक मिनट के लिए उस समय उलब्ध संसाधनों की मदद से एक सेना को लेकर यूनान से भारत की सीमा तक आने को विश्व मान भी लें तो भी सत्य यही है की उस विश्व विजेता सिकंदर को भारत एक छोटे से राज्य के राजा पोरस ने , जिसका राज्य भारत के नक़्शे पर एक बिंदु से बड़ा नहीं था , उसने बैरंग डाक की तरह लौटाया था। बहुत सारे लोगों को मेरी बात कि पोरस ने सिकंदर को हराया था , हजम नहीं हुई होगी। ये वो लोग हैं जो अंग्रेजों के लिखे भारतीय इतिहास को ही सही मानते हैं। ऐसे लोगों के वैसे तो समझाने का कोई फायदा नहीं है , पर फिर भी हम एक पोस्ट अलग से लिखेंगे , जिसमें कुछ तर्कों के माध्यम से उनको समझाने का प्रयास करेंगे कि कैसे सिकंदर ने पोरस को नहीं बल्कि पोरस ने सिकंदर को हराया था । उस पोस्ट का लिंक यहाँ अवश्य पेस्ट करेंगे। (लीजिये लिक ये रहा : क्या वास्तव में सिकंदर ने पोरस को हराया था ? (Did really Alexander defeated Porus?)  वैसे भारत में ऐसे लोगों की भी कमी नहीं है जो यदि पूछ लिया जाये कि तक्षशिला कहाँ पर था तो वो उसे बिहार में बातएंगे क्योंकि वो तक्षशिला और नालंदा में फर्क नहीं कर पाएंगे और यदि पूछ लिया जाये कि कालिदास कौन था तो वो बोलेंगे की शायद अकबर का नवरतन होगा। ऐसे लोगों ने अंग्रेजी इतिहास पढ़ लिया , यही गनीमत है। वैसे भी भारत को बाहरी लोगों ने नहीं , बल्कि घर के लोगों ने ही हराया है। जालियां वाला बाग में जिन लोगों ने गोलियां चलाई वो हाथ भारतीय थे।  रानी लक्ष्मी बाई पर जिन हाथों ने तलवारें चलाई वो अधिकतर हाथ भारतीय थे।

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3. भारत ने शून्य की खोज की थी (India invented zero)

अब इससे तो कोई इंकार नहीं करेगा की भारतीयों ने शून्य यानि की जीरो की खोज की थी। जरा एक बार उन रोमन संख्याओं को याद करो जहाँ बीस लिखने के किये लिए X को दो बार लिखना पड़ता था और तीस लिखने के लिए X को तीन बार लिखना पड़ता था। सोचो कि क्या हाल होता गिनतियों का शून्य के बिना। तो मेरे मित्रो दुनिया को भारत ने ही सिखाया कि जिसकी वैल्यू कुछ नहीं होती , उस जीरो की वैल्यू बहुत होती है।

यहाँ तक कि अंग्रेजी शब्द Geometry और Trigonometry भी हिंदी शब्द ज्यामिति और त्रिकोणमिति से बने हैं।

4. भारतीय गिनती पूरी दुनिया इस्तेमाल करती है (Indian counting system is used all over word)

10 Good Things About India


आज ज्यादातर भारतीयों को यह नहीं पढ़ाया जाता की जो गिनती वो अंग्रेजी भाषा में स्कूलों में वन , टू , थ्री , फोर करके पढ़ते हैं , उनका जन्मदाता देश उनका देश भारत ही है , क्योंकि यह बात उनको उनकी किताबें नहीं बतातीं।  पर यह एक सच्चाई है कि 1 ,2 , 3 , 4 ...... को दुनिया को हमने ही सिखाया। जिन लोगों को अभी भी भरोसा नहीं है और जिनको अंग्रेजों की बताई बात ही सही लगती है , वो अंग्रेजों के बनाये इंटरनेट पर अंग्रेजी गूगल पर अंग्रेजी वेब्सीटों पर चैक कर सकते हैं। उनको यह देखकर और भी सदमा लग सकता है कि इनको आज भी हिन्दू - अरेबिक नुमेरल्स (Hindu–Arabic numeral system or Indo-Arabic numeral system) कहा जाता है। खैर जिनको अपने देश पर घमंड नहीं है उनको छोड़ देते है और उनसे बात करते है जिनको इस बात पर भरोसा है। यदि आप सरसरी तौर पर देखेंगे तो पाएंगे की हिंदी और अंग्रेजी की गिनती के जीरो , एक ,दो , तीन और दस तो अंग्रेजों बिलकुल ही कॉपी और पेस्ट कर डाले।

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5. भारत ने दुनिया को मसाले दिए (India gave spices to the world)

जरा सोचें , यदि भारत ने दुनिया को मसाले ना दिए होते तो आज दुनिया का खाना कितना बेस्वाद होता। ये भारत के मसाले ही थे जो अंग्रेजों को भारत तक खींच लाये।  ये भारत के मसाले ही थे , जिनके लिए कोलंबस चला तो भारत की ओर नया समुंद्री मार्ग ढूंढने था पर मिल गया उसे अमरीका। देखी भारतीय मसालों की शक्ति , एक पूरा महाद्वीप ही मिल गया। आज भारत के मसालों की खुशबू पूरी दुनिया में महक रही है। क्या है दुनिया के  पास हमारे मसालों को छोड़कर एक भी ऐसी चीज जो पूरी दुनिया को महका सके।

6. भारत ने दुनिया को योग दिया (India gave Yoga to the world)

आज भारत के योग का लोहा पूरी दुनिया मान चुकी है। आज दुनिया को स्वस्थ रखने में योग का अभूतपूर्व योगदान है। भारत की यह प्राचीन पद्यति पूरे विश्व में लोकप्रिय हो चुकी है। सबसे बड़ी  बात है की योग की यह स्वीकार्यता सहज है , इसमें भारत सरकार की ओर से इसको लोकप्रिय करने के लिए कोई विशेष कदम नहीं उठाये जैसे कि पश्चिमी देश अपने उत्पादों को लोकप्रिय करने के लिए साम , दाम , दंड , भेद सभी तकनीकों का प्रयोग करते हैं।  योग ने  सभी धार्मिक सीमाओं को भी तोड़ दिया है। लगभग सभी धर्मों के लोगों ने इसे स्वस्थ रहने के लिए उत्तम अभ्यास माना है।

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7. भारत ने दुनिया को भगवान बुद्ध दिए (India gave Buddha to the world)

आज से लगभग 2300 साल पहले जब विश्व विजेता सिकंदर खून की नदियाँ बहाता भारत की ओर बढ़ रहा था , ठीक उसके कुछ दशकों बाद भारत भी निकला विश्व विजय के लिए , लेकिन तलवार लेकर नहीं , बल्कि भगवान बुद्ध के विचार लेकर। जहाँ आज सिकंदर का साम्राज्य कहीं नहीं है , वहीं भगवान बुद्ध के विचार बुद्ध धर्म के रूप में कई देशों में ज्ञान का फैला रहे हैं।  1879 में प्रकाशित सर एडविन अर्नोल्ड की किताब में , उसने भगवान बुद्ध को एशिया का प्रकाश स्तंभ यानि की (Light of Asia) कहा है।

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8. भारत ने दुनिया को फिर अहिंसा का पाठ पढ़ाया (India taught Non-Violence to the world)

बीसवीं सदी में दुनिया जब विश्व युद्धों में उलझी हुई थी और कई देशों को सिर्फ युद्ध ही हर समस्या का हल दिख रहा था , तब एक बार फिर भारत के राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने दुनिया का दिखा दिया कि अहिंसा से भी वह सब कुछ प्राप्त किया जा सकता है जिसे उस समय की दुनिया की महाशक्तियां बन्दूक में ढूंढ रही थी। जिस ब्रिटिश राज के बारे में ऐसा कहा जाता था की उसका सूर्य कभी अस्त नहीं हो सकता , एक आदमी ने बिना किसी अस्त्र शस्त्र के अस्त कर दिया। दुनिया देखती रह गयी कि किस तरह बिना कोई गोली चले एक गुलाम देश की निहत्थी जनता से , एक समृद्ध देश की उन्नत सरकार हार गयी।

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9. भारत ने दुनिया को बताया कि पेड़ पौधों में जीवन है (India told the world that plants have life)

बीसवीं सदी तक जब सारी दुनिया यह मानती थी कि पेड़ पौधे निर्जीव होते है , तब भारत के जगदीश चंद्र बसु ने अपने बनाये हुए क्रेस्को ग्राफ (Crescograph) यन्त्र से दुनिया को यह दिखा दिया की पेड़ पौधे भी हमारी तरह जीवित होते है , साँस लेते हैं तथा अपने आस पास के वातावरण के प्रति संवेदनशील होते हैं। जरा सोचिये , जहाँ समृद्ध देशों के वैज्ञानिक , जिनके पास अपने समय की एक से बढ़कर एक तकनीक थी , जब उनके दिमाग में यह विचार नहीं आया तो , एक जगदीश चंद्र बसु के दिमाग में यह आईडिया कैसे आया। शायद इसका राज छुपा है हमारी संस्कृति में जिसमें जानवरों और पेड़ पौधों को भी उतना ही पवित्र मानकर उनकी पूजा की जाती है जितनी कि भगवान को। पीपल और तुलसी की पूजा होते तो आपने अवश्य देखी होगी। थोड़ा दिमाग पर जोर डालें तो हमें यह भी याद आ जाएगा कि हमारे बड़े बूढ़े हमें रात में पौधों में पानी देने से क्यों रोकते थे और कहते थे कि रात को पौधे सो रहे होते हैं , इसलिए रात में पौधों को पानी नहीं देना चाहिए और किस प्रकार जब सीता माता को रावण उठा ले गया था , तब कैसे रामचंद्र जी ने व्यथित होते हुए पेड़ों से उनका पता पूछा था।  यदि राम जी थोड़ा भी दक्षिण की बजाये उत्तर की ओर ढूंढते हुए चले गए होते तो जटायु और हनुमान जी से उनकी भेंट कभी नहीं हुई होती।

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10. भारत ने दुनिया को बताया कि चन्द्रमा पर पानी है (India told world that Moon has water)

इक्कीसवीं सदी में भी भारत का योगदान दुनिया के लिए जारी है। ज्यादातर हिन्दुस्तानियों को यह नहीं पता कि हमारे भारत के चंद्रयान 1 ने चन्द्रमा पर पानी की खोज की थी।  ऐसा इसलिए क्योंकि हम अपनी ही उपलब्धियों को कम करे आंकते हैं। यदि यह खोज कहीं पश्चिम में हुई होती तो अब तक हमारे स्कूल के बच्चों की किताबों में एक चैप्टर (अध्याय) बन कर आ चुकी होती और सब हिन्दुस्तानियों को पता होती , परन्तु क्योंकि खोज भारत ने की है इसीलिए न तो पश्चिमी मीडिया कुछ बोलेगा ना ही हम कुछ कहेंगे। आलम यह है कि अगर गलती से आपको यह बात पता है कि चन्द्रमा पर पानी की खोज भारत के चंद्रयान 1 ने की थी और अगर आप किसी को बताएंगे तो वो आपको ऐसे देखेगा जैसे आपने उसको मनोहर कहानियां का कोई किस्सा सुना दिया हो और बाकी उसकी शक्ल बता देगी कि उसने आप की बात पर कोई विश्वास नहीं किया है।


एक बार सोचो , जहां पश्चिमी देश छोटी छोटी खोज को दुनिया से साँझा करने की अरबों खरबों डॉलर रॉयल्टी मांगते हैं , वहीं यदि भारत ने दुनिया से सिर्फ अपनी गिनती, शून्य और योग इस्तेमाल करने  की रॉयल्टी मांग ली तो शायद दुनिया कंगाल हो जाएगी।

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हिन्दू धर्म की 10 विशेषताएं (10 Unique Things About Hinduism)

हिंदी एवं संस्कृत के कथन जो भारतीय संस्कृति तो दर्शाते हैं (Quotes in Hindi and Sanskrit Showing Values of Indian Culture)

हिंदी कहानी - मूर्ति में भगवान दिखाई देना (Hindi Story - To see God in statue)


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हिन्दू धर्म की 10 विशेषताएं (10 Unique Things About Hinduism)

Hinduism

1. हिन्दू धर्म सबसे पुराना धर्म है

बाकी प्राचीन धर्म जहां आधुनिक धर्मों के आगे टिक नहीं पाए वही हमारा हिन्दू धर्म अपने मूर्त रूप में आज भी लगभग वैसे के वैसे कायम हैं। आज भी हिन्दू धर्म में पूजा की वही पद्यतियाँ और जीवन जीने की वही मन्यताऐ हैं जो आज से हजारों साल पहले थी। जहां इतिहास में आक्रांताओं ने बहुत सारे देश की धर्म और संस्कृति को बिलकुल ही बदल दिया , वही भारत में आकर वो भी नहीं समझ पाए की क्या करें क्योंकि यहाँ उनका सामना एक ऐसे धर्म से हुआ जिसमें एक से अधिक भगवान , करोड़ों देवी देवता , अनेको पंथ संप्रदाय और अनगिनत मान्यताएँ थीं। हजारों सालों के वैज्ञानिक और वैचारिक बदलावों को अपने में समेटते हुए हिन्दू धर्म आज भी वैसे ही कायम है।


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2. हिन्दू धर्म में एक से अधिक भगवान और करोड़ों देवी देवता हैं।

जहाँ आधुनिक धर्म एक ही भगवान और एक ही तरह की पूजा पद्यति पर जोर देते हैं वहीं हिन्दू धर्म में हर आदमी अपना भगवान चुनने के लिए स्वतंत्र है। तुलसीदास जी ने लिखा है "जाकी रही भावना जैसी , प्रभु मूरत देखि तिन वैसी", इसका मतलब है जो भगवान के प्रति जैसी भावना रखता है , भगवान उसे उसी रूप में दिखाई देते हैं । और मजे की बात है सब हिन्दू सभी भगवानों को बराबर मानते हैं , क्योंकि उनको पता है कि सभी एक ही हैं। उदाहरण के लिए मैं हनुमान जी का परम भक्त हूँ परन्तु मैं दुर्गा माता , शिवजी , राम जी , कृष्ण जी आदि को भी उतना ही मानता हूँ जितना कि हनुमान जी को , है न आश्चर्य की बात। यहाँ एक घर से दुसरे घर में अलग अलग भगवान की मूर्ति देखने को आसानी से मिल सकती है , अलग अलग पूजा के तरीके हो सकते हैं पर सभी भगवानों के प्रति भावनाएं एक जैसी ही मिलेंगी।


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3. हिन्दू धर्म का कोई संस्थापक नहीं है।

जहाँ बाकि धर्मों में उसके संस्थापक का नाम और उसका जन्म दिन आसानी से बताया जा सकता है , वही हिन्दू धर्म में किसी को भी नहीं मालूम की हिन्दू धर्म की शुरुआत किसने की। यदि ब्रह्मा , विष्णु और शिवजी को इस धर्म का सबसे बड़ा भगवान मान लें , तो किसी को नहीं मालूम की ब्रह्मा जी , विष्णु जी और शिवजी का जनम कब हुआ।


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4. हिन्दू धर्म , स्त्री शक्ति की पूजा करने वाला संसार का एकमात्र बड़ा धर्म है।

हिन्दू धर्म संसार का एकमात्र धर्म है जहाँ देवताओं और भगवानों के साथ देवियों की भी पूजा की जाती है। क्यों ना हो , भारत की तो संस्कृति में ही है , "यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:", यानि कि जहाँ स्त्री की पूजा होती है वहीं देवता रहते है। और ये कहानी तो सबने सुनी ही होगी कि जब शिवजी ने गणेश जी का सिर काट दिया था तब पार्वती जी के गुस्से के सामने किसी भगवान या देवता की नहीं चली थी और पार्वती जी का क्रोध शांत करने के लिए शिवजी को कैसे गणेश जी के धड़ के साथ हाथी के बच्चे का सिर जोड़ना पड़ा था। फिर हमें धन भी तो देवी लक्ष्मी से और विद्या, देवी सरस्वती से ही मिलती है।


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5. हिन्दू धर्म अपने सबसे प्रचलित भगवानों से भी पुराना है।

तो मित्रो , हिन्दू धर्म की पांचवी बड़ी विशेषता है कि , यह धर्म अपने सबसे प्रचलित भगवानों के जन्म से भी अधिक पुराना है। राम , कृष्ण और हनुमान जी हिन्दू धर्म में सबसे प्रचलित भगवानों में से हैं। इन तीनों का जन्म दिवस भी लोगों को मालूम (हां वर्ष भले ही ना मालूम हो), लेकिन ये सब जब भी धरती पर अवतार लेकर आए , हिन्दू धर्म पहले से मौजूद था यानि कि इतने बड़े भगवानों ने भी हिन्दू धर्म की शुरुआत नहीं की बल्कि वे तो खुद हिन्दू धर्म में पैदा हुए।


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6. हिन्दू धर्म में कोई नहीं जानता की हिन्दू धर्म में सबसे परम शक्तिशाली भगवान कौन  है।

यह हिन्दू धर्म एक और विशेषता है। कुछ लोग मानते हैं की विष्णु जी सबसे बड़े है तो कुछ लोग शिवजी को सबसे बड़ा मानते हैं। कुछ लोग विष्णु और शिव को बराबर मानते हैं तो कुछ लोग वेदों के अनुसार ब्रह्म को सबसे बड़ा मानते हैं।  कुछ लोग ओम को सबसे बड़ा मानते हैं तो कुछ आदिशक्ति या दुर्गा माता को। सबकी अपनी अपनी मान्यता है। सबसे अच्छी बात यह है की कोई किसी भी भगवान को बड़ा माने लेकिन वो दूसरे भगवान को छोटा भी नहीं मानता। उदहारण के लिए विष्णु जी को बड़ा मानने वाला कभी भी शिवजी को छोटा नहीं बोलेगा , बल्कि वो शिवजी को भी उतना ही शक्तिशाली मानेगा जितना की विष्णु जी को।


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7. हिन्दू धर्म में भगवान स्वयं धरती पर अवतार लेकर आते है।

संसार के बड़े धर्मों में केवल हिन्दू धर्म ही ऐसा धर्म है , जिसमें भगवान बार बार धरती पर स्वयं आते है। कभी राम और कृष्ण के रूप में वे मानव जन्म लेते हैं और धरती को पापियों के अत्याचारों से मुक्त करते हैं तो कभी वे मीरा जैसे भक्तों की पुकार सुनकर अपने असल रूप में ही प्रकट हो जाते है।


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8. हिन्दू धर्म में मृत्यु के बाद भी जीवन है।

हिन्दू धर्म की मान्यताओं के अनुसार यह शरीर कुछ भी नहीं और आत्मा ही सबकुछ है। अपने कर्मों के अनुसार आत्मा तब तक विभिन्न योनियों में जन्म लेती रहती है जब तक की अपने अच्छे कर्मों के कारण उसे मोक्ष प्राप्त नहीं हो जाता। आत्मा के इस प्रकार जन्म लेने को हिन्दू धर्म में पुनर्जन्म कहा गया है और यह केवल हिन्दू धर्म एवं इससे निकले और धर्मों की ही विशेषता है। हिन्दू धर्म के अनुसार आत्मा अजर और अमर है। इसीलिए हम लोग साल में एक बार श्राद्ध करते हैं , जिसमें हम, जो लोग देह त्याग चुके हैं , यानि कि मर चुके हैं उनको भोजन कराते है , क्योंकि हम मानते हैं कि भले ही वे लोग इस जीवन से जा चुके हैं परन्तु अपने कर्मों के अनुसार किसी दूसरी योनि में वे जन्म ले चुके हैं।


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9. हिन्दू धर्म में गाय की पूजा होती है।

जी हाँ मित्रों , ना केवल गाय बल्कि सभी पशुओं को हिन्दू धर्म में पवित्र माना जाता है और ऐसा इसलिए क्योंकि हम लोग मानते हैं की जानवरों के अंदर भी वही आत्मा वास करती है जो हमारे अंदर है और शरीर तो मात्र इस जन्म के कर्तव्यों के निर्वाहन का साधन मात्र है। इसी कारण से आज भी भारत की बहुत बड़ी आबादी शाकाहारी है। और गाय को पवित्र मानते के पीछे कारण यह है कि हम गाय का दूध पीते हैं इसलिए गाय हमारे लिए माँ सामान होती है। गाय ही नहीं हम उन सभी चीजों की पूजा करते हैं जो हमें कुछ ना कुछ देते हैं , जैसे कि हम सूरज को भगवान मानते है क्योंकि सूर्य से हमें ऊर्जा मिलती हैं इसीलिए जीवनदायी जल देने वाली नदियों और फल एवं छाया देने वाले वृक्षों की भी हम पूजा करते हैं।


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10. हिन्दू धर्म , एक धर्म ना होकर जीवन जीने का तरीका है।

भारत के सुप्रीम कोर्ट ने भी हिन्दू धर्म की परिभाषा एक धर्म के रूप में ना करके , "Way of Life", यानि कि जीवन पद्यति के रूप में की है। जी  हाँ , वास्तव में हिन्दू धर्म नाम को कोई धरम नहीं है। हिन्दू शब्द तो मध्य एशिया के लोगों ने भारतीय उपमहाद्वीप में रहने वाले लोगों की अलग जीवन शैली को दिया है जिसे हमने अपनी बाकी धर्मों से अलग पहचान बनाने के लिए अपना लिया है। वास्तव में हमने अपनी जीवन शैली को कभी धर्म नहीं माना और यदि हमारी जीवन शैली को कोई नाम देना ही है तो सनातन" शब्द अधिक सही रहेगा। वैसे भी अंग्रेजी शब्द रिलिजन (Religion) का हिंदी अथवा संस्कृत कोई समानांतर शब्द नहीं होता है। जो लोग रिलिजन (Religion) का हिंदी मतलब धर्म मानते हैं , वे पूरी तरह ठीक नहीं हैं क्योंकि रिलिजन (Religion) का मतलब होता है एक प्रकार के भगवान और एक प्रकार की पूजा पद्यति को मानना , जबकि हिंदी शब्द धर्म का मतलब होता है ड्यूटी (Duty) यानि कि कर्त्तव्य।

यूनान , मिस्र , रोम सब मिट गए जहाँ से ,
कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी।


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हिंदी एवं संस्कृत के कथन जो भारतीय संस्कृति को दर्शाते हैं (Quotes in Hindi and Sanskrit Showing Values of Indian Culture)

Indian Culture is always welcoming
and inclusive.

हिंदी एवं संस्कृत में कही / लिखी गयी अच्छी बातें जिनसे भारतीय संस्कृति का गहराई से पता चलता है।
Quotes, told and written in Hindi and Sanskrit which gives us insight of Indian culture.


अतिथि देवो भव

हिंदी में : मेहमान भगवान होता है।
In English : Guest is God
Note : Perhaps India is the only culture where Guest are given status of God, because Indians believe that God can come in any form to you, disguised as guest even. So, if we treat our guest as God, we will not miss a chance to serve our God, even by mistake.


वसुधैव कुटुंबकम

हिंदी में : सारा संसार एक परिवार है।
In English : Whole world is one family.
Note : Perhaps India is the only culture where it is said that whole world is one family.

अहिंसा परमो धर्मः

हिंदी में : अहिंसा परम धर्म है।
In English : Non Violence is the highest religion (duty).
Note : This is the only reason why Indian culture never invaded any other culture by force as we believe in non violence. Also this is the reason why still a sizable population of India is vegetarian as they see non vegetarian as violence towards poor animals.


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माता गुरुतरा भूमि , पिता उच्चतरः खात।

हिंदी में : माँ भूमि से बड़ी है , पिता आसमान से ऊंचा है।
Note : Mother is greater than earth and father is higher than sky

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता

हिंदी में : जहाँ स्त्रियों की पूजा होती है वहाँ देवता निवास करते हैं।
In English : God live there, where women are worshiped.
Note : India is the only culture where feminine power (Goddess) is worshiped.

जाकि रही भावना जैसी प्रभु मूरत देखि तिन वैसी।

हिंदी में : जो भगवान के प्रति जैसी भावना (भाव) रखता है , भगवान की मूर्ति (शक्ल - सूरत) उसे उसी प्रकार की दिखाई देती है।
In English : You will see the God's image similar to the feeling in you regarding him.
Note : This is the beauty of Hinduism which allows everyone to visualize and follow his own God and his own path towards salvation.This might be the reason why Hinduism has so many Gods and so many ways of worship.


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जननी जन्मभूमि च स्वर्गात अपि गरीयसी

हिंदी में : माता और मातृ भूमि स्वर्ग से भी महान है।
Note : Mother and Mother Land are greater than heaven.

गुरु गोविन्द दोउ खड़े काके लागू पाय , 

बलिहारी गुरु आपने गोविन्द दियो मिलाय।

हिंदी में : यदि  गुरु और भगवान दोनों मेरे सामने आ जाएं तो मैं किसके पैर छुऊं।  धन्यवाद गुरु आपको कि आपने भगवान से मिला दिया।  (इसीलिए गुरु के पैर भगवान से पहले छूने चाहिए।
In English : If I get to meet my teacher and god together, whom should I salute first. Definitely to the teacher because it is because of teacher, I could meet God.
Note : This shows that in Indian culture even the teacher which lead us to the God is is given more importance than the God.

त्वमेव माता च पिता त्वमेव , त्वमेव बंधु च सखा त्वमेव , 

त्वमेव विद्या च द्रविणं त्वमेव , त्वमेव सर्वम मम देव देव।

हिंदी में : (भगवान), आप ही मेरी माता हो  और आप ही मेरे पिता हो , आप ही मेरे रिश्तेदार हो और आप ही मेरे मित्र हो , आप ही विद्या हो और आप ही मेरी धन संपत्ति हो , हे देव तुम ही मेरे सब कुछ हो।
In English : You are my mother and you are my father, you are my relative and you are my friend, you are my knowledge and you are my wealth, O god you are my everything.
Note : This shows the complete devotion towards the God.


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समुद्रवसने देवि पर्वतस्तनमण्डले,

विष्णुपत्नि नमस्तुभ्यं पादस्पर्शं क्षमस्वमे। 

हिंदी में : समुंद्र जिसका वस्त्र है, पर्वत जिसके स्तन हैं , विष्णुपत्नी (धरती माँ) को मैं  नमस्कार करता हूँ और पैर से छूने के लिए माफी मांगता हूँ ।
In English : Ocean is whose dress, mountains are whose bosom, I pray to Lord Vishnu's wife , this mother earth and say sorry before touching her with my feet.
Note : These are beautiful lines where we say sorry to the mother earth before stepping on to it in the very morning every day.

मातृवत पर दारेषु , पर द्रवेषु लोष्ठ्वात,

आत्मवत सर्वभूतेषु , यः पश्यति सः पंडितः। 

हिंदी में : दूसरे की स्त्री को माता के समान , दुसरे के धन को मिट्टी के समान, सभी प्राणियों को अपने समान जो देखता है वही पंडित है।
In English : He who see is other's ladies as mother, other's money as dust, all humans like himself is scholar.
Note : This stanza tells to respect all women, everyone's money and every other human being.


सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः, 

सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःख भाग्भवेत्।

हिंदी में : सभी सुखी हों, सभी रोगमुक्त रहें, सभी का जीवन मंगलमय बनें और कोई भी दुःख का भागी न बने।
In English : All should be happy, all should be free from diseases, all's life should be prosperous and nobody should get any sorrow.
Note : In this shloka prayer is done for benefit of entire life on the planet.


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स्वदेशे पूज्यते राजा विद्वान सर्वत्र पूज्यते।

हिंदी में : राजा की पूजा अपने देश में ही होती है , जबकि विद्वान की पूजा सभी जगह होती है।
In English : King is worshiped is its own country, scholar is worshiped everywhere.
Explanation : In these line importance of education (not bookish but being being scholar) is shown where a scholar is given more importance than a king.


ॐ द्यौः शान्तिरन्तरिक्षं शान्तिः 

पृथिवी शान्तिरापः शान्तिरोषधयः शान्तिः । 

वनस्पतयः शान्तिर्विश्वेदेवाः शान्तिर्ब्रह्म शान्तिः 

सर्वं शान्तिः शान्तिरेव शान्तिः सा मा शान्तिरेधि ॥ 

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥

हिंदी में : ओम,आसमान में शांति हो , अंतरिक्ष में शांति हो, पृथ्वी पर शांति हो , जल में शांति हो , औषधियो में शांति हो, पेड़ पौधों में शांति हु , विश्व के सभी देवताओं में शांति हो , परब्रह्म में शांति हो , सभी जगह शांति ही शांति हो , ओम शांति शांति शांति।
In English : Om, peace be in sky, peace be in space, peace be on earth, peace be on water, peace be in medicinal herbs, peace be in trees and plants, peace be in all deities in world, peace be in supreme God, peace every where, peace, peace, peace.
Note : This is a prayer of peace where wish of peace is made on universe level.

Such is the level of thinking of Indian culture. In above all lines/shlokas no where any thing is said in context to India only, rather everything is said for the whole humanity, whole world, whole life and whole universe. This makes them very selfless. This is the height of Indian culture and Hinduism which is so inclusive by nature.


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