हिंदी कहानी - जब रातों रात एक पूरा जंगल ही उग गया ( Hindi Story - When a forest appeared overnight)

When a forest appeared overnight

वह चलता जा रहा था। उसके हाथ में एक छड़ी थी , जिसके ऊपर एक हैंडल लगा हुआ था। इसी छड़ी का सहारा लेकर वो चल रहा था। लोग उसे पागल समझते थे , क्योकि वो उसे हमेशा ऐसे ही खाली जमीन पर घूमते हुए देखते थे। वो एक दिन में कई कई मील पैदल चलता था। वो लोगों से कम ही बातचीत किया करता था। परन्तु जो लोग उसे जानते थे वो उसे बहुत सम्मान दिया करते थे और प्यार से बाबा कहते थे। वो हमेशा घूमता ही रहता था और केवल अपने रोजमर्रा की चीजें खरीदने के लिए ही बाहरी दुनिया से संपर्क करता था। कुछ वर्षों से लोगो ने उसको कभी कभार ही देखा था क्योंकि उसने शायद अपना घर अब जंगल के बीच में ही बसा लिया था।

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उसके बच्चे काफी समृद्ध थे और विदेश में बसे थे। बच्चों ने तो उसे भी उनके साथ चलने के लिए कहा था जब उसकी पत्नी का निधन हुआ था। परन्तु उसने यहीं रहने का फैसला किया था। अच्छी खासी पेंशन थी उसकी।  इंडियन फारेस्ट सर्विस से रिटायर हुआ था वो। क्या क्या सपने संजोये थे उसने अपनी रिटायरमेंट के बाद की जिंदगी के लिए। वो सोचता था की रिटायरमेंट के बाद वो अपनी पत्नी , जिसको वो इस दुनिया में सबसे अधिक प्यार करता था , के साथ एक सुकून भरा समय व्यतीत करेगा। बच्चों से तो उसकी मोह ममता तभी से कम हो गयी थी जब से वो विदेश में जाकर बस गए थे। पर शायद किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। रिटायरमेंट से कुछ ही महीने पहले उसकी पत्नी को एक ऐसी बीमारी ने जकड़ लिया , जिसका कोई इलाज नहीं था। जिस पत्नी के साथ उसने रिटायरमेंट के बाद की जिंदगी के सपने संजोये थे , उसी को उसे रिटायरमेंट से पहले ही इस संसार से विदा करना पड़ा। अपनी पत्नी के जाने के बाद वह अंदर से टूट चुका था। पत्नी के जाने के बाद उसने खाली जमीनों पर घूमना ही अपनी जिंदगी बना ली थी।

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उसके टहलने के रफ़्तार बहुत धीमी थी। हर कदम के बाद वो अगला कदम उठाने से पहले कुछ क्षण के लिए रुकता था। उसकी छड़ी अंदर से खोखली थी , उसमें ठीक हैंडल के नीचे सूराख करकर एक बीजों की थैली को इस प्रकार से फंसाया गया था कि जैसे ही वो हर कदम के बाद रूककर हैंडल पर प्रेशर डालता था , थैली से एक बीज सरककर खोखली छड़ी में सरक जाता था और नीचे चला जाता था। नीचे उसकी छड़ी इतनी पैनी थी कि उसके हाथ के प्रेशर से ही जमीन में दो इंच गहरा एक छेद हो जाता था और बीज उसमें चला जाता था। वो छड़ी उठाता था और पैर से मिटटी सरकाकर उस छेद को भर देता था और आगे बढ़ जाता था। इस तरह वो हजारों बीज रोज बो देता था , वो भी बिना किसी को पता चले। धीरे धीरे उसने आस पास की सारी खाली जमीन में बीज बो दिए थे। उसका रोज घर से निकलकर वहां तक पहुंचने में बहुत समय बर्बाद होता था जहाँ तक उसने पिछले दिन बीज बो दिए थे। इसलिए उसने अपना शहर वाला घर छोड़ दिया था और जहाँ बीज बो रहा होता था वही अस्थायी झोपड़ी बनाकर रह लेता था। ये काम वो पिछले दस साल से कर रहा था।

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लोगों को पता ही नहीं चला कि कब उनके पास ही एक बड़ा जंगल उगने लगा था। उनको तो महसूस तब हुआ जब पेड़ थोड़े बड़े हो गए। किसी को नहीं पता था कि से कैसे हुआ पर सब खुश थे क्योंकि अब उनके आस पास की खाली पड़ी जमीनें हरी भरी हो गयीं थी। उधर वन विभाग भी रातों रात उग आये इस सैकड़ो मील बड़े जंगल को देखकर बहुत खुश था। उसके संरक्षण के लिए बड़े बड़े अधिकारी रोज मीटिंग कर रहे थे। आखिरकार वन विभाग ने सभी पेड़ों को नंबर देने का निर्णय लिया और जोर शोर से काम शुरू भी कर दिया। आज वन विभाग के आला अधिकारियों की फिर एक मीटिंग हो रही थी। चिंता का विषय यह था कि पेड़ों पर नंबर डालते वक्त कई अधिकारियों ने यह बात नोट की थी की एक बूढ़ा व्यक्ति उन जंगलों में घर बना कर रहता है जो की जंगलों के संरक्षण के लिए ठीक नहीं है। वह अवश्य ही जंगलों को नुकसान पंहुचा सकता है और हो सकता है उसने अपनी झोपड़ी पेड़ काट कर ही बनायी हो। वो अपनी झोपड़ी का स्थान भी बदलता रहता है और खुद भी पूरा दिन जंगलों के पास ही घूमता रहता है। पुराने अधिकारी तो उसको पहचान भी चुके थे। वो उन्हीं के डिपार्टमेंट से दस साल पहले रिटायर हुआ था जिसकी पत्नी ठीक रिटायरमेंट से पहले किसी लाइलाज बीमारी से मर गयी थी। खैर कोई भी हो , वन विभाग के लिए वन संरक्षण से बढ़कर कुछ भी नहीं था। इसलिए उसको नोटिस देकर 30 दिन के भीतर भीतर जंगल खाली करने के लिए कहने का निर्णय हो चुका था।

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आज जब वो बीज बोकर अपनी झोंपड़ी पर लौटा तो उसने एक सरकारी नोटिस अपनी झोंपड़ी के दरवाजे पर चिपका देखा जिसके हिसाब से जंगल में बसा उसका घर , जंगल के लिए खतरा था और उसको ३० दिन के अंदर अंदर जंगल छोड़ कर जाने के लिए कहा गया था। समाप्त।

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